कोलकाता: चुनाव आयोग द्वारा तृणमूल कांग्रेस के नाम और 'घास पर जोड़ा फूल' चुनाव चिह्न को अंतरिम रूप से फ्रीज किए जाने के बाद राज्य की राजनीति में सरगर्मी तेज हो गई है। आयोग के निर्देशानुसार, ममता बनर्जी और रितव्रत बनर्जी दोनों ही प्रतिद्वंद्वी शिविरों ने तय समयसीमा के भीतर अपने-अपने नए वैकल्पिक नामों और चुनाव चिह्नों की सूची ईएमएस/ईमेल के जरिए निर्वाचन आयोग को सौंप दी है।
चुनाव आयोग के फैसले पर কালীঘাট (कालीघाट) की कड़ी आपत्ति
निर्वाचन आयोग के इस अंतरिम निर्णय से ममता बनर्जी का 'कालीघाट' शिविर बेहद आहत और असंतुष्ट है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी नेताओं ने आयोग के इस कदम पर कड़ी आपत्ति जताई है और कड़ा जवाब भेजा है। ममता शिवर का मानना है कि पार्टी की स्थापना और उसकी मूल पहचान के साथ इस तरह का निर्णय अनुचित है। हालांकि, आदेश का पालन करते हुए उन्होंने अपने विकल्पों की सूची भेज दी है और जरूरत पड़ने पर भविष्य में कानूनी रास्ता अपनाने का विकल्प भी खुला रखा है।
रितव्रत शिविर द्वारा सुझाए गए नए नाम
दूसरी ओर, रितव्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय कार्यसमिति के गुट ने शुक्रवार सुबह हुई ऑनलाइन बैठक के बाद अपने नए नाम तय किए। उन्होंने मुख्य रूप से दो नामों—'नेशनलिस्ट तृणमूल कांग्रेस' और 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस'—को ई-मेल के जरिए चुनाव आयोग को भेजा है। तीसरे विकल्प के रूप में 'वेस्ट बंगाल तृणमूल कांग्रेस' के नाम पर भी चर्चा हुई थी, लेकिन इसे प्रादेशिक मानकर सूची से हटा दिया गया, ताकि राष्ट्रीय पहचान बनाए रखी जा सके।
मुक्त प्रतीकों (Free Symbols) में से विकल्पों का चयन
आयोग की ओर से जारी 184 मुक्त प्रतीकों की सूची में से दोनों पक्षों ने अपनी पसंद के चुनाव चिह्न चुने हैं। रितव्रत शिविर ने अपनी सूची में खफा, ब्लैकबोर्ड और टॉर्च जैसे प्रतीकों को प्राथमिकता दी है, ताकि मतदाताओं के बीच प्रचार करने में आसानी हो। वहीं, कालीघाट शिविर ने भी अपनी तरफ से तीन संभावित प्रतीकों के विकल्प आयोग को भेज दिए हैं, ताकि आगामी उपचुनावों में बिना किसी बाधा के उम्मीदवारों को मैदान में उतारा जा सके।
28 साल पुराने प्रतीक और नाम पर फिलहाल विराम
लगभग 28 साल पहले 1998 में जब ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की नींव रखी थी, तब 'जोड़ाফুল' (जोड़ा फूल) प्रतीक उनकी राजनीतिक पहचान का मुख्य आधार बना था। लेकिन मौजूदा आंतरिक कलह और कानूनी खींचतान के चलते यह पहला मौका है जब राज्य में होने वाले आगामी विधानसभा उपचुनावों में इस पारंपरिक प्रतीक का इस्तेमाल कोई भी धड़ा नहीं कर पाएगा। दोनों पक्षों को अब आयोग के अंतिम निर्णय का इंतजार है।
कानूनी और राजनीतिक भविष्य की अनिश्चितता
चुनाव आयोग अब दोनों पक्षों द्वारा भेजे गए नामों और चुनाव चिह्नों की जांच करेगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे किसी अन्य पंजीकृत दल से मेल न खाते हों। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल प्रतीकों की लड़ाई नहीं है, बल्कि बंगाल की मुख्य विपक्षी ताकत के रूप में खुद को स्थापित करने की एक बड़ी राजनीतिक जंग है, जिसका असर आने वाले दिनों में राज्य के चुनावी समीकरणों पर पड़ना तय है।