कोलकाता: निर्वाचन आयोग के एक कड़े और बड़े अंतरिम आदेश के बाद पश्चिम बंगाल की सियासत में भूचाल आ गया है, जिसके तहत तृणमूल कांग्रेस के पारंपरिक 'जोड़ाफुल' (घास पर जोड़ा फूल) प्रतीक और पार्टी के नाम के इस्तेमाल पर फिलहाल रोक लगा दी गई है। इस हालिया फैसले के बाद से राज्य की राजनीति में ममता बनर्जी और रितव्रत बनर्जी दोनों ही प्रतिद्वंद्वी शिविरों के सामने यह गंभीर सवाल खड़ा हो गया है कि वे आगामी राजनीतिक गतिविधियों और चुनावों के लिए कौन सा नया नाम और कौन सा नया चुनाव चिह्न चुनेंगे।
चुनाव आयोग की 'फ्री सिंबल' सूची और विकल्प
निर्वाचन आयोग के नियमों के मुताबिक, मान्यता खोने या विवाद की स्थिति में दलों को मुक्त प्रतीकों (Free Symbols) की सूची से विकल्प चुनने होते हैं। आयोग की इस सूची में एयर कंडीशनर, अलमारी, कैंची, सीटी, और बांसुरी समेत कुल 184 मुक्त प्रतीक उपलब्ध हैं। राजनीतिक दलों को अपनी पसंद के नामों और प्रतीकों की प्राथमिकता सूची आयोग को सौंपनी होती है, जिसके बाद उपलब्धता और अन्य दलों से टकराव की स्थिति की जांच कर अंतिम मुहर लगाई जाती है।
ममता बनर्जी के लिए बांसुरी या रंग-पैलेट की चर्चा
आयोग की सूची में 64वें नंबर पर मौजूद 'बांसुरी' को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। विरोधी दलों का कहना है कि पार्टी में टूट के बाद ममता बनर्जी के लिए यह प्रतीक यह दर्शाने का माध्यम बन सकता है कि पुराने समर्थक उनकी एक पुकार पर कितना साथ देते हैं। इसके अलावा, 44वें नंबर पर मौजूद 'रंग और तूलिका' (Colour Tray and Brush) भी एक विकल्प हो सकता है, क्योंकि लंबे समय से नीले-सफेद रंग की थीम ममता सरकार की पहचान का हिस्सा रही है।
रितव्रत बनर्जी के शिविर के लिए 'कैंची' और 'माइक' की चर्चा
दूसरी ओर, रितव्रत बनर्जी के खेमे के लिए आयोग की सूची में 133वें नंबर पर मौजूद 'कैंची' (Scissors) को लेकर भी राजनीतिक विश्लेषक चर्चा कर रहे हैं, जो राजनीतिक रूप से पार्टी के विभाजन और नए रास्ते की ओर इशारा कर सकता है। इसके अलावा 97वें नंबर पर मौजूद 'माइक' (Microphone) प्रतीक भी एक मजबूत विकल्प साबित हो सकता है, क्योंकि एक अच्छे वक्ता के रूप में जाने जाने वाले रितव्रत अपनी बात और नीतियों को जनता तक आसानी से इस माध्यम से पहुँचा सकते हैं।
तकनीकी और अन्य अजीबोगरीब प्रतीक विकल्प
मुक्त प्रतीकों की सूची में कंप्यूटर माउस, दूरबীন (दूरबीन), और रबर स्टैंप जैसे विकल्प भी शामिल हैं। कंप्यूटर माउस को अपनाने से युवा और तकनीक-प्रेमी छवि पेश करने में मदद मिल सकती है, हालांकि मतदाताओं को इसके इस्तेमाल के प्रति जागरूक करना होगा। वहीं, कई ऐसे प्रतीक भी हैं जिन्हें लेकर राजनीतिक दलों में आपसी चुटकी और व्यंग्य का दौर भी शुरू हो गया है, क्योंकि कुछ प्रतीकों का राजनीतिक अर्थ निकालकर विरोधी दल तंज कस रहे हैं।
जमीनी स्तर पर नई चुनौती और प्रचार की रणनीति
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि दशकों से 'जोड़ाफुल' प्रतीक बंगाल के हर घर की पहचान बन चुका था। ऐसे में रातों-रात नया चुनाव चिह्न मिलने पर उसे ग्रामीण और बूथ स्तर तक के मतदाताओं के बीच पहुंचाना, ईवीएम में उसके बटन की जानकारी देना और नया संगठन खड़ा करना एक बड़ी चुनौती होगी। फिलहाल, आयोग के इस फैसले के बाद राज्य में राजनीतिक बयानबाजी और नए प्रतीकों को लेकर सरगर्मी अपने चरम पर है।