भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बुधवार को ऋण एवं अग्रिम पर ब्याज दर निर्धारण संबंधी नए मसौदा दिशानिर्देश जारी किए हैं। इस पहल का उद्देश्य बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के लिए ब्याज दर तय करने की प्रक्रिया में समानता स्थापित करना है। अभी तक वाणिज्यिक बैंकों के लिए ब्याज दर निर्धारण को लेकर स्पष्ट नियामकीय ढांचा मौजूद था, जबकि एनबीएफसी मुख्य रूप से आचरण संबंधी नियमों के आधार पर कार्य करती थीं। प्रस्तावित व्यवस्था इस अंतर को समाप्त कर वित्तीय प्रणाली में अधिक पारदर्शिता और निष्पक्षता लाने का प्रयास है।
सभी विनियमित संस्थाओं के लिए एक समान सिद्धांत आधारित व्यवस्था
आरबीआई के मसौदे के अनुसार, सभी विनियमित संस्थाओं के लिए ब्याज दर निर्धारण के व्यापक सिद्धांत लागू होंगे। यह व्यवस्था स्थिर (फिक्स्ड) और परिवर्तनशील (फ्लोटिंग) दोनों प्रकार के ऋणों पर समान रूप से लागू होगी। हालांकि प्रत्येक संस्था अपने कारोबार की प्रकृति, आकार और जटिलता के अनुरूप इन सिद्धांतों का पालन करेगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विभिन्न वित्तीय संस्थानों के बीच ग्राहकों के साथ ब्याज दरों के मामले में अनावश्यक भिन्नता न रहे और ऋण मूल्य निर्धारण अधिक तार्किक एवं पारदर्शी हो।
ऋण मूल्य निर्धारण की पूरी प्रक्रिया होगी अधिक स्पष्ट
प्रस्तावित नीति के तहत प्रत्येक संस्था को ब्याज दर तय करने की स्पष्ट पद्धति अपनानी होगी। इसमें आंतरिक मानकों का निर्धारण, जोखिम के आधार पर अतिरिक्त ब्याज (रिस्क प्रीमियम), विभिन्न ऋण श्रेणियों के लिए मूल्य निर्धारण का आधार तथा ब्याज दर तय करने के अधिकार किस स्तर पर होंगे, जैसे सभी पहलुओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना होगा। आरबीआई ने यह भी प्रस्तावित किया है कि सूक्ष्म-वित्त (माइक्रोफाइनेंस) ऋणों को भी इसी नीति के दायरे में शामिल किया जाएगा, ताकि छोटे उधारकर्ताओं के लिए भी पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित हो सके।
एक अप्रैल 2027 से लागू करने का प्रस्ताव, सुझाव आमंत्रित
मसौदा दिशानिर्देशों को ‘भारतीय रिजर्व बैंक (ऋण एवं अग्रिम पर ब्याज दर) दिशानिर्देश, 2026’ नाम दिया गया है। आरबीआई ने इन्हें 1 अप्रैल 2027 से लागू करने का प्रस्ताव रखा है। इससे पहले केंद्रीय बैंक ने सभी संबंधित पक्षों, वित्तीय संस्थानों और आम नागरिकों से 11 सितंबर 2026 तक सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की हैं। प्राप्त सुझावों की समीक्षा के बाद अंतिम दिशानिर्देश जारी किए जाएंगे।
गवर्नर की घोषणा के बाद आया मसौदा
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने पहले ही संकेत दिया था कि बैंकिंग और गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों के बीच ब्याज दर निर्धारण के नियमों में समानता लाने की दिशा में काम किया जाएगा। उसी घोषणा के अनुरूप यह मसौदा जारी किया गया है। प्रस्तावित नियम केवल भारत में संचालित घरेलू कारोबार पर लागू होंगे और इनका उद्देश्य ऋण बाजार में प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ ग्राहकों के हितों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
ग्राहकों और वित्तीय क्षेत्र पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मसौदा वर्तमान स्वरूप में लागू होता है तो ऋण लेने वाले ग्राहकों को ब्याज दर तय करने की प्रक्रिया अधिक स्पष्ट और समझने योग्य होगी। बैंक और एनबीएफसी दोनों को अपने मूल्य निर्धारण मॉडल को अधिक पारदर्शी बनाना पड़ेगा, जिससे मनमाने अंतर की संभावना कम होगी। साथ ही, जोखिम आधारित मूल्य निर्धारण की स्पष्ट नीति से संस्थानों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बढ़ने और वित्तीय प्रणाली में विश्वास मजबूत होने की उम्मीद है।