अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य तनाव को लेकर आर्थिक जगत में चिंता बढ़ने लगी है। देश के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक एसबीआई की अनुसंधान इकाई की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि यह संघर्ष लंबा चलता है तो इसका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार लंबे समय तक चलने वाले युद्ध से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ेगी, जिससे वैश्विक मंदी का खतरा पैदा हो सकता है और कई देशों की आर्थिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है।
महंगाई और बाजारों में अस्थिरता की आशंका
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस तरह के भू-राजनीतिक संकट का सीधा असर ऊर्जा बाजार और वित्तीय प्रणालियों पर पड़ता है। यदि युद्ध जारी रहता है तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे महंगाई का दबाव बढ़ेगा। ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का प्रभाव परिवहन, उत्पादन और उपभोक्ता वस्तुओं की लागत पर पड़ता है, जिससे वैश्विक स्तर पर मुद्रास्फीति बढ़ सकती है। इसके साथ ही वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव और निवेशकों की अनिश्चितता भी बढ़ने की संभावना जताई गई है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव
रिपोर्ट के अनुसार यदि संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका असर भारत के प्रमुख आर्थिक संकेतकों पर भी पड़ सकता है। विशेष रूप से कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से देश का आयात बिल बढ़ेगा और चालू खाते का घाटा बढ़ने की आशंका है। इससे आर्थिक संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यदि वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बनी रहती है तो भारत की आर्थिक वृद्धि दर पर भी दबाव पड़ सकता है।
केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप से बाजारों को सहारा
हालांकि रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारतीय वित्तीय बाजार फिलहाल अपेक्षाकृत स्थिर बने हुए हैं। इसका प्रमुख कारण केंद्रीय बैंक द्वारा उठाए गए कदम हैं। केंद्रीय बैंक ने सरकारी प्रतिभूतियों की प्रतिफल दर को संतुलित बनाए रखने और मुद्रा विनिमय दर में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए बाजार में हस्तक्षेप किया है। इन कदमों से निवेशकों का भरोसा बना हुआ है और घरेलू वित्तीय प्रणाली को स्थिरता मिली है।
होर्मुज जलडमरूमध्य की रणनीतिक अहमियत
रिपोर्ट में पश्चिम एशिया के होर्मुज जलडमरूमध्य का भी विशेष उल्लेख किया गया है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। दुनिया के लगभग बीस प्रतिशत कच्चे तेल का व्यापार इसी मार्ग से होता है। यदि इस मार्ग पर किसी प्रकार की बाधा आती है तो वैश्विक तेल बाजार पर तुरंत प्रभाव पड़ता है और कीमतों में तेजी देखी जाती है। हालिया तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पहले ही ऊंचे स्तर पर पहुंच चुकी हैं।
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के संभावित परिणाम
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि यदि कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल दस डॉलर की वृद्धि होती है तो आने वाले वित्त वर्ष में भारत का चालू खाते का घाटा लगभग छत्तीस आधार अंक तक बढ़ सकता है। वहीं यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें एक सौ तीस डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती हैं तो भारत की आर्थिक वृद्धि दर घटकर लगभग छह प्रतिशत तक आ सकती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ऊर्जा कीमतों में बदलाव का देश की आर्थिक सेहत पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
दीर्घकालिक आर्थिक चक्र से जुड़ा विश्लेषण
एसबीआई अनुसंधान ने अपने अध्ययन में ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी इस संघर्ष का विश्लेषण किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियां लंबे आर्थिक चक्र के अंतिम चरण के साथ मेल खाती हैं, जिसे कोंड्राटिएफ तरंग सिद्धांत के रूप में जाना जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार वैश्विक अर्थव्यवस्था समय-समय पर लंबे चक्रों से गुजरती है, जिनमें तकनीकी परिवर्तन, आर्थिक संरचना और राजनीतिक घटनाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसे समय में होने वाले बड़े संघर्ष वैश्विक आर्थिक संरचना पर दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ सकते हैं।
Comments (0)