भारत में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) ने बीते कुछ वर्षों में भुगतान प्रणाली की तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े कारोबारी और आम उपभोक्ता तक बड़ी संख्या में नकदी के बजाय डिजिटल भुगतान को प्राथमिकता देने लगे हैं। वर्ष 2020 में UPI लेनदेन पर MDR समाप्त किए जाने के बाद इसका उपयोग अभूतपूर्व गति से बढ़ा। अब सरकार डिजिटल भुगतान तंत्र को दीर्घकालिक रूप से आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने के उद्देश्य से बड़े व्यापारियों पर सीमित MDR शुल्क लगाने के विकल्प पर विचार कर रही है। हालांकि अभी इस संबंध में कोई अंतिम निर्णय घोषित नहीं किया गया है।
क्या होता है MDR और क्यों हो रही इसकी वापसी पर चर्चा
मर्चेंट डिस्काउंट रेट वह शुल्क होता है, जो डिजिटल माध्यम से भुगतान स्वीकार करने पर व्यापारी अपने बैंक या भुगतान सेवा प्रदाता को देता है। इस शुल्क के माध्यम से भुगतान नेटवर्क, बैंक और तकनीकी कंपनियां अपने परिचालन, सुरक्षा और तकनीकी ढांचे का खर्च वहन करती हैं। UPI को बढ़ावा देने के लिए जनवरी 2020 में इसे पूरी तरह समाप्त कर दिया गया था। इसके बाद डिजिटल भुगतान में रिकॉर्ड वृद्धि हुई, लेकिन लगातार बढ़ते लेनदेन के साथ बैंकों और फिनटेक कंपनियों पर परिचालन लागत भी तेजी से बढ़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि भुगतान प्रणाली को भविष्य में भी निर्बाध बनाए रखने के लिए एक संतुलित राजस्व मॉडल आवश्यक हो सकता है।
किन व्यापारियों पर लग सकता है प्रस्तावित शुल्क
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार प्रस्तावित MDR सभी व्यापारियों पर लागू नहीं होगा। विचार यह है कि केवल उन बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों को इसके दायरे में लाया जाए, जिनका वार्षिक कारोबार लगभग एक से डेढ़ करोड़ रुपये या उससे अधिक है। साथ ही दो हजार रुपये से अधिक मूल्य के UPI लेनदेन पर ही शुल्क लागू करने का विकल्प भी विचाराधीन बताया जा रहा है। यदि ऐसा होता है तो देश के लगभग 90 प्रतिशत छोटे और मध्यम दुकानदार इस व्यवस्था से बाहर रहेंगे और उन्हें किसी अतिरिक्त शुल्क का भुगतान नहीं करना पड़ेगा। इससे छोटे व्यवसायों पर आर्थिक बोझ बढ़ने की आशंका भी काफी हद तक समाप्त हो जाएगी।
आम उपभोक्ताओं के लिए क्या होगा असर
प्रस्तावित व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसका प्रभाव सीधे आम उपभोक्ताओं पर पड़ने की संभावना नहीं है। रिपोर्टों के अनुसार UPI से भुगतान करने वाले ग्राहकों से कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा और वे पहले की तरह निःशुल्क डिजिटल भुगतान कर सकेंगे। यानी यदि कोई व्यक्ति दुकान, रेस्तरां, मेडिकल स्टोर या अन्य प्रतिष्ठान पर UPI से भुगतान करता है, तो उसे अलग से कोई MDR नहीं देना होगा। इस प्रकार उपभोक्ताओं के लिए UPI की सरलता और सुविधा यथावत बनी रहने की संभावना है, जबकि शुल्क का दायित्व केवल पात्र बड़े व्यापारियों तक सीमित रहेगा।
बैंक और फिनटेक कंपनियां क्यों कर रही हैं मांग
डिजिटल भुगतान का विस्तार जितनी तेजी से हुआ है, उतनी ही तेजी से भुगतान अवसंरचना, साइबर सुरक्षा, सर्वर क्षमता, डेटा प्रोसेसिंग और तकनीकी रखरखाव पर खर्च भी बढ़ा है। अब प्रतिदिन करोड़ों UPI लेनदेन सुरक्षित और निर्बाध तरीके से संपन्न कराना बैंकों और फिनटेक कंपनियों के लिए बड़ी जिम्मेदारी बन चुका है। अब तक सरकार इस व्यवस्था के लिए प्रोत्साहन और सब्सिडी उपलब्ध कराती रही है, लेकिन बजटीय प्रावधानों में कमी आने के बाद उद्योग संगठनों और संसदीय समिति ने सुझाव दिया है कि बड़े व्यापारियों से सीमित MDR लेकर इस भुगतान प्रणाली को वित्तीय रूप से अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है। इससे भविष्य में नेटवर्क की गुणवत्ता और सुरक्षा बनाए रखने में भी सहायता मिलेगी।
डिजिटल अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ सकता है प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि MDR केवल बड़े व्यापारियों तक सीमित रहता है और उपभोक्ताओं व छोटे कारोबारियों को इससे बाहर रखा जाता है, तो डिजिटल भुगतान की गति पर व्यापक नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना कम होगी। भारत आज विश्व के सबसे बड़े डिजिटल भुगतान बाजारों में शामिल है और UPI इसकी सबसे बड़ी ताकत बन चुका है। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती यह है कि एक ओर भुगतान प्रणाली का विस्तार जारी रहे और दूसरी ओर उसे संचालित करने वाले बैंक तथा तकनीकी संस्थान भी आर्थिक रूप से सक्षम बने रहें। अंतिम निर्णय आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि प्रस्तावित व्यवस्था किस स्वरूप में लागू होगी और इसका व्यापार जगत पर वास्तविक प्रभाव कितना पड़ेगा।