यह लोकतंत्र की खूबसूरती ही है कि किसी भी दल का हिस्सा नहीं होते हुए भी कुछ निर्दलीय मजबूत प्रत्याशी प्रदेश में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं और जीतने के बाद जनता का बेहतर काम आने का भरोसा दिला रहे हैं। यह और बात है कि ऐसे मजबूत प्रत्याशियों की निर्दलीय के रूप में चुनाव मैदान में उपस्थिति राजनीतिक पार्टियों खासकर भाजपा और कांग्रेस के लिए मुश्किल की स्थिति पैदा करती है।
मध्य प्रदेश के चुनावी रण में इस बार भी कुछ ऐसे निर्दलीय प्रत्याशी ताल ठोक रहे हैं, जो अपने आप में दल होने का दम भर रहे हैं और भाजपा-कांग्रेस का खेल बिगाड़ भी सकते हैं। इनमें अधिकतर नेता वे ही हैं, जिन्होंने भाजपा और कांग्रेस से टिकट न मिलने से नाराज होकर अपनी अलग राह पकड़ ली है।
पिछले चुनाव की तुलना में इस बार इनकी संख्या कुछ अधिक है। इनमें कुछ तो पूर्व सांसद और विधायक भी हैं। इनको लेकर दोनों दल सतर्क भी हैं, क्योंकि जातीय और स्थानीय समीकरणों के कारण इनका अपना मजबूत जनाधार भी है।
यह लोकतंत्र की खूबसूरती ही है कि किसी भी दल का हिस्सा नहीं होते हुए भी कुछ निर्दलीय मजबूत प्रत्याशी प्रदेश में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं और जीतने के बाद जनता का बेहतर काम आने का भरोसा दिला रहे हैं। यह और बात है कि ऐसे मजबूत प्रत्याशियों की निर्दलीय के रूप में चुनाव मैदान में उपस्थिति राजनीतिक पार्टियों खासकर भाजपा और कांग्रेस के लिए मुश्किल की स्थिति पैदा करती है। मध्य प्रदेश के चुनावी रण में इस बार भी कुछ ऐसे निर्दलीय प्रत्याशी ताल ठोक रहे हैं, जो अपने आप में दल होने का दम भर रहे हैं और भाजपा-कांग्रेस का खेल बिगाड़ भी सकते हैं। इनमें अधिकतर नेता वे ही हैं, जिन्होंने भाजपा और कांग्रेस से टिकट न मिलने से नाराज होकर अपनी अलग राह पकड़ ली है।
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