रायपुर: शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की अनिवार्यता को लेकर छत्तीसगढ़ में शिक्षकों के बीच चिंता बढ़ती जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब प्रदेश के विभिन्न शिक्षक संगठन सरकार से मांग कर रहे हैं कि सेवारत शिक्षकों के लिए विभागीय स्तर पर अलग से TET परीक्षा आयोजित की जाए। संगठनों का कहना है कि लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को अचानक प्रतियोगी परीक्षा के दायरे में लाने से बड़ी संख्या में शिक्षक प्रभावित हो सकते हैं।शिक्षक संगठनों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की ओर से TET योग्यता हासिल करने के लिए 31 अगस्त 2028 तक की समय-सीमा तय की गई है। ऐसे में शिक्षकों के पास निर्धारित अवधि के भीतर पात्रता हासिल करने की चुनौती है। इसे देखते हुए शिक्षक संगठन राज्य सरकार से जल्द विभागीय TET कराने की मांग कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बढ़ी सक्रियता
TET की अनिवार्यता को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देश के कई राज्यों में शिक्षक संगठनों की गतिविधियां तेज हुई हैं। छत्तीसगढ़ में भी अलग-अलग शिक्षक संगठनों ने सरकार के सामने अपनी मांगें रखना शुरू कर दिया है।शिक्षक नेताओं का कहना है कि जब कुछ अन्य राज्यों में सेवारत शिक्षकों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए विभागीय स्तर पर TET कराने की व्यवस्था पर काम किया जा रहा है, तो छत्तीसगढ़ में भी इसी तरह का विकल्प अपनाया जाना चाहिए।उनका तर्क है कि वर्षों से सरकारी स्कूलों में सेवाएं दे रहे शिक्षकों को सामान्य अभ्यर्थियों के साथ परीक्षा प्रक्रिया में शामिल करने के बजाय उनके अनुभव और सेवा अवधि को ध्यान में रखते हुए अलग व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
विभागीय स्तर पर परीक्षा कराने की मांग
छत्तीसगढ़ शालेय शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष , प्रदेश शिक्षक फेडरेशन के प्रांताध्यक्ष और प्रमुख महामंत्री ने राज्य सरकार से TET मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है।शिक्षक संगठनों का कहना है कि सरकार चाहे तो लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) के माध्यम से सेवारत शिक्षकों के लिए विभागीय TET आयोजित कर सकती है। इससे शिक्षकों को परीक्षा की तैयारी के लिए स्पष्ट व्यवस्था मिलेगी और बड़ी संख्या में शिक्षकों के सामने पैदा हुई अनिश्चितता भी कम होगी।
25-30 साल से सेवा दे रहे शिक्षकों को राहत देने की मांग
शिक्षक संगठन विशेष रूप से उन शिक्षकों को राहत देने की मांग कर रहे हैं, जो दो से तीन दशक से सरकारी सेवा में हैं। वीरेंद्र दुबे के अनुसार, 23 अगस्त 2010 से पहले नियुक्त किए गए शिक्षकों के लिए उस समय भर्ती नियमों में TET अनिवार्य नहीं था। ऐसे में उनका कहना है कि पुराने नियमों के आधार पर नियुक्त शिक्षकों को बाद में TET की अनिवार्यता के दायरे में लाने से पहले उनकी सेवा अवधि और नियुक्ति की परिस्थितियों पर विचार किया जाना चाहिए।
शिक्षक संगठनों का तर्क है कि जिन लोगों ने 25 से 30 वर्षों तक शिक्षा विभाग में सेवाएं दी हैं, उन्हें TET जैसी पात्रता परीक्षा के कारण सेवा संबंधी परेशानी का सामना नहीं करना चाहिए। ऐसे शिक्षकों के लिए विशेष छूट या वैकल्पिक व्यवस्था की मांग की जा रही है।
'जब MP में विभागीय TET हो सकती है तो CG में क्यों नहीं?'
छत्तीसगढ़ टीचर्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष संजय शर्मा ने भी विभागीय TET को लेकर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि यदि मध्यप्रदेश में सेवारत शिक्षकों के लिए TET आयोजित की जा सकती है, तो छत्तीसगढ़ में भी लोक शिक्षण संचालनालय के स्तर पर ऐसी परीक्षा कराने की व्यवस्था बनाई जा सकती है।शिक्षक संगठनों का मानना है कि विभागीय परीक्षा का आयोजन होने से शिक्षकों को एक निश्चित प्रक्रिया के तहत परीक्षा देने का अवसर मिलेगा और सरकार भी इसकी निगरानी बेहतर तरीके से कर सकेगी।
विशेष प्रशिक्षण और अध्ययन सामग्री की भी मांग
शिक्षक संगठनों ने केवल विभागीय TET आयोजित करने की मांग ही नहीं की है, बल्कि परीक्षा की तैयारी में शिक्षकों की मदद के लिए अतिरिक्त व्यवस्थाएं करने की भी अपील की है।इनमें प्रभावित शिक्षकों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम, परीक्षा से संबंधित अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराना और तैयारी के लिए पर्याप्त समय देने जैसी मांगें शामिल हैं।
शिक्षक नेताओं का कहना है कि लंबे समय से अध्यापन कार्य कर रहे शिक्षकों के लिए अचानक परीक्षा की तैयारी करना आसान नहीं होगा। इसलिए सरकार को सिर्फ परीक्षा आयोजित करने के बजाय तैयारी के लिए भी आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए।
MP और CG में करीब दो लाख शिक्षक प्रभावित होने का दावा
शिक्षक संगठनों के अनुसार TET की अनिवार्यता का असर छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में सेवारत शिक्षकों पर पड़ सकता है।संगठनों का दावा है कि छत्तीसगढ़ में करीब 80 हजार और मध्यप्रदेश में एक लाख से अधिक शिक्षक इससे प्रभावित हो सकते हैं। इसी वजह से दोनों राज्यों में शिक्षक संगठन इस मुद्दे को लेकर सक्रिय हैं।शिक्षक संगठनों का कहना है कि सरकारों को इस मामले में शिक्षकों की व्यावहारिक समस्याओं को समझते हुए राहत का रास्ता तलाशना चाहिए।
पुनर्विचार याचिका को लेकर भी नाराजगी
शिक्षक संगठनों की ओर से सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका के मुद्दे पर भी सरकार से सहयोग की अपेक्षा जताई जा रही है।शिक्षक नेताओं का आरोप है कि पुनर्विचार याचिका को लेकर सरकार की ओर से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है। उनका कहना है कि इस मामले में राज्य सरकार को शिक्षकों के पक्ष को मजबूती से सामने रखने के लिए पहल करनी चाहिए।संगठनों ने यह भी कहा कि इस विषय पर संसद में चर्चा की उम्मीद थी, लेकिन शिक्षकों को राहत देने के लिए कोई ठोस सुझाव सामने नहीं आया।
शिक्षकों में बढ़ रहा असंतोष
TET की अनिवार्यता को लेकर प्रदेश के शिक्षकों में असंतोष बढ़ने की बात भी शिक्षक संगठन कह रहे हैं। उनका कहना है कि वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों के भविष्य को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई है।वीरेंद्र दुबे ने कहा कि TET व्यवस्था 2010 के बाद लागू हुई, इसलिए उससे पहले नियुक्त शिक्षकों को लेकर सरकार को अलग से विचार करना चाहिए। शिक्षक संगठन इस मांग को लेकर आगे की रणनीति तैयार कर रहे हैं।
आंदोलन की तैयारी में शिक्षक संगठन
मामले का समाधान नहीं होने पर शिक्षक संगठनों ने आंदोलन का संकेत भी दिया है। संगठनों की जल्द बैठक प्रस्तावित है, जिसमें TET को लेकर आगे की रणनीति तय की जा सकती है।शिक्षक नेताओं का कहना है कि उनकी प्राथमिकता सरकार के साथ बातचीत के जरिए समाधान निकालना है, लेकिन यदि मांगों पर सकारात्मक पहल नहीं हुई तो आंदोलन का रास्ता अपनाया जा सकता है।
अब सरकार के फैसले पर नजर
फिलहाल TET को लेकर छत्तीसगढ़ के हजारों सेवारत शिक्षकों की निगाहें राज्य सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। शिक्षक संगठन विभागीय स्तर पर परीक्षा कराने, पुराने शिक्षकों को राहत देने और परीक्षा की तैयारी के लिए विशेष व्यवस्था उपलब्ध कराने की मांग कर रहे हैं।आने वाले दिनों में सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती है और क्या विभागीय TET कराने को लेकर कोई औपचारिक निर्णय लिया जाता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। वहीं शिक्षक संगठनों की प्रस्तावित बैठक के बाद आंदोलन की दिशा भी स्पष्ट हो सकती है।