रायपुर। दिल्ली में हुए GEN-Z प्रोटेस्ट की गूंज अब छत्तीसगढ़ की राजनीति में भी सुनाई देने लगी है। चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन सोशल मीडिया पर सियासी मुकाबला तेज हो गया है। छत्तीसगढ़ बीजेपी ने 'GEN-Z Vs बाबर की विरासत' नाम से सोशल मीडिया कैंपेन शुरू किया है। पार्टी लगातार वीडियो पोस्ट कर यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि देशहित और राष्ट्रवाद के साथ खड़ा असली युवा कौन है।
उर्वशी पलांडुरकर का वीडियो हुआ वायरल, बहस ने पकड़ा राजनीतिक रंग
इसी बीच सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर उर्वशी पलांडुरकर का एक वीडियो तेजी से वायरल हो गया। वीडियो में उर्वशी ने अपने घर में रखी ट्रॉफियां दिखाते हुए कहा कि ये केवल डांस की नहीं, बल्कि एकेडमिक्स, योगा और कराटे जैसी उपलब्धियों की भी पहचान हैं। वीडियो को करोड़ों व्यूज़ मिले और देखते ही देखते सोशल मीडिया पर शुरू हुई बहस राजनीतिक मुद्दा बन गई।
कांग्रेस का आरोप- युवाओं को बांटने की कोशिश कर रही बीजेपी
कांग्रेस ने बीजेपी के पूरे सोशल मीडिया कैंपेन पर सवाल खड़े किए हैं। पार्टी का आरोप है कि दिल्ली के GEN-Z प्रोटेस्ट से बीजेपी घबरा गई है और अब युवाओं की आवाज दबाने के लिए उन्हें बांटने की राजनीति कर रही है। कांग्रेस का कहना है कि सोशल मीडिया के जरिए मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है।
पोस्टर वॉर से रील वॉर तक पहुंची राजनीति
राजनीतिक दलों की रणनीति भी अब तेजी से बदल रही है। पहले चुनावी पोस्टर और सभाओं में नारे सुर्खियां बनते थे, लेकिन अब रील, शॉर्ट वीडियो और हैशटैग ट्रेंड राजनीतिक हथियार बन चुके हैं। एक वीडियो के जवाब में दूसरा वीडियो और फिर जवाबी वीडियो का सिलसिला लगातार जारी है। ऐसे में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि 2028 का चुनाव ईवीएम से पहले सोशल मीडिया के एल्गोरिदम पर लड़ा जाएगा, जहां वोट से पहले व्यूज़ और वायरल होने की प्रतिस्पर्धा होगी।
बीजेपी का जवाब- बिना तथ्य के आरोप लगाती है कांग्रेस
कांग्रेस के आरोपों पर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल ने संतुलित प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उन्होंने संबंधित वीडियो अभी नहीं देखा है, इसलिए उसे देखने के बाद ही कोई टिप्पणी करेंगे। साथ ही उन्होंने कहा कि कांग्रेस अक्सर बिना तथ्यों के आरोप लगाती रहती है।
सोशल मीडिया बना नया सियासी रण
डिजिटल दौर में सोशल मीडिया अब केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का अहम मंच बन चुका है। राजनीतिक दलों के बीच अब जमीनी प्रचार के साथ-साथ डिजिटल नैरेटिव की भी लड़ाई तेज होती जा रही है। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सोशल मीडिया वास्तव में चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा रणक्षेत्र बनकर उभरता है।