विश्व धरोहर स्थल खजुराहो में इस वर्ष खजुराहो नृत्य महोत्सव 2026 का शुभारंभ अत्यंत गरिमामय वातावरण में हुआ। यहां स्थित ऐतिहासिक देवालयों में कंदारिया महादेव मंदिर, चतुर्भुज मंदिर, वामन मंदिर, चित्रगुप्त मंदिर और पार्वती मंदिर जैसे प्राचीन स्थापत्य चमत्कारों की छाया में यह उत्सव कला, अध्यात्म और सांस्कृतिक वैभव का अनूठा मिश्रण प्रस्तुत करता है। पत्थरों में प्राणों की अनुभूति कराने वाले इन देवालयों की दिव्यता के बीच जब मंच पर भारतीय शास्त्रीय नृत्यों की स्वर-लय बहती है, तो खजुराहो एक जीवंत सांस्कृतिक उपवन प्रतीत होने लगता है।
मुख्यमंत्री का संदेश और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से समारोह का उद्घाटन करते हुए इसे भारत की सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत उत्सव बताया। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश कला और संस्कृति के संरक्षण के प्रति पूर्णतः समर्पित है और इसी उद्देश्य से राज्य बजट में संस्कृति विभाग की गतिविधियों हेतु विशेष वृद्धि की गई है। मुख्यमंत्री ने देशभर से आए शीर्ष कलाकारों और विभिन्न नृत्य शैलियों के प्रतिनिधियों का हार्दिक स्वागत करते हुए इसे भारतीय कलात्मकता का वैश्विक मंच बताया।
प्रधानमंत्री के संस्कृति–दर्शन का उल्लेख
अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आदि संस्कृति को सनातन संस्कृति से जोड़ने की जो पुकार दी है, वही इस महोत्सव की आत्मा में प्रवाहित होती है। खजुराहो नृत्य महोत्सव केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा, नृत्य-कला की गौरवशाली धारा और शिव-नटराज की जटाओं से झरती लय का अद्वितीय मिलन है।
नटराज को समर्पित 52वाँ महोत्सव
इस वर्ष का 52वाँ खजुराहो नृत्य समारोह भगवान नटराज को समर्पित है, जिसे लेकर कला जगत में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। भारतीय शास्त्रीय नृत्य की जड़ें नटराज की तांडव–लय से अनुप्राणित मानी जाती हैं, और इसी भावधारा को मंचित करते हुए देश के प्रख्यात नृत्यांगनाओं और कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से आयोजन को दिव्यता से भर दिया। समारोह में प्रस्तुत शास्त्रीय नृत्य शैलियाँ केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय अध्यात्म, सौंदर्यशास्त्र और अनादि परंपरा का जीवंत संलयन हैं।
कलाकारों का आकर्षण और खजुराहो की सांस्कृतिक पहचान
मुख्यमंत्री ने कहा कि मध्यप्रदेश सदैव कला-साधकों का स्वागत करता है और खजुराहो की पावन भूमि में आने वाले कलाकार पुनः यहां लौटने की इच्छा रखते हैं। देवालयों की मर्मस्पर्शी ऊर्जा, प्राचीन कला की गरिमा और शास्त्रीय नृत्य की अनुभूति कलाकारों को इस धरती से गहन भावनात्मक रूप से जोड़ देती है। सात दिवसीय यह महोत्सव न केवल देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करता है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में और अधिक सशक्त बनाता है।
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