नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की सेंट्रल जोन बेंच ने मध्यप्रदेश में जारी 237 विवादित पर्यावरणीय मंजूरियों में से रेत खनन से जुड़ी 9 मंजूरियों को अवैध करार देते हुए शून्य घोषित कर दिया है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि ये मंजूरियां स्टेट एनवायरमेंट इंपैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी (SEIAA) के विधिसम्मत मूल्यांकन के बिना जारी की गई थीं।
वैधानिक प्रक्रिया के बिना दी गई मंजूरियां शुरू से ही शून्य
NGT ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि SEIAA की स्वीकृति के बिना जारी की गई पर्यावरणीय मंजूरियां प्रारंभ से ही अमान्य हैं। ट्रिब्यूनल ने निर्देश दिए हैं कि जब तक SEIAA की विधिसम्मत मंजूरी नहीं मिलती, तब तक प्रदेश में किसी भी खदान में खनन कार्य नहीं किया जा सकेगा।
सभी मामलों को पुनर्विचार के लिए SEIAA को वापस भेज दिया गया है। यह फैसला जस्टिस श्यो कुमार सिंह और एक्सपर्ट मेंबर सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने सुनाया।
पन्ना की रेत खदानें बनीं विवाद की जड़
मामले की जड़ पन्ना जिले की रेत खदानों से जुड़ी पर्यावरणीय मंजूरियां रहीं। जांच में NGT ने पाया कि 9 रेत खदानों के लिए न तो अनिवार्य जनसुनवाई कराई गई और न ही नियमों का पालन किया गया। इसके बावजूद डीम्ड क्लॉज का गलत इस्तेमाल कर मंजूरी दे दी गई। इनमें से कई खदानें जलमग्न क्षेत्रों में स्थित थीं, जहां खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है।
SEIAA अध्यक्ष के पत्रों को किया गया नजरअंदाज
SEIAA अध्यक्ष एस.एन.एस. चौहान ने इन अनियमितताओं को लेकर 48 पत्र लिखे, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
क्या है पूरा मामला
मार्च से मई 2025 के बीच SEIAA की कोई बैठक नहीं हो सकी। अध्यक्ष एस.एन.एस. चौहान लगातार बैठक बुलाने के लिए मेंबर सेक्रेटरी आर. उमा माहेश्वरी को पत्र लिखते रहे, लेकिन उनके अवकाश पर चले जाने के कारण बैठकें नहीं हो पाईं। इसी दौरान तत्कालीन प्रमुख सचिव नवनीत कोठारी के अनुमोदन पर प्रभारी मेंबर सेक्रेटरी श्रीमन शुक्ला ने 23 मई को 237 डीम्ड पर्यावरणीय मंजूरियां जारी कर दीं। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अंततः NGT ने इन मंजूरियों को शून्य घोषित कर दिया।
NGT की कड़ी टिप्पणी
NGT ने इस पूरे प्रकरण पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि SEIAA की बैठकें जानबूझकर नहीं होने दी गईं, ताकि डीम्ड मंजूरियों के जरिए नियमों को दरकिनार किया जा सके। ट्रिब्यूनल ने इसे अधिकारों के दुरुपयोग और पर्यावरणीय अपराधों को बढ़ावा देने वाला गंभीर मामला बताया और कहा कि इसमें प्रशासनिक जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
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