हिंदी सिनेमा ने मां और बच्चे के रिश्ते को शब्दों और धुनों के जरिए जिस गहराई से पर्दे पर उतारा है, उसमें लोरियों की अपनी अलग जगह रही है। 1977 में प्रदर्शित फिल्म ‘मुक्ति’ भी इसी परंपरा की याद दिलाती है। फिल्म का गीत ‘लल्ला लल्ला लोरी, दूध की कटोरी’ रिलीज के करीब 49 साल बाद भी श्रोताओं के बीच अपनी मासूम मिठास बनाए हुए है। इस गीत की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें बच्चे को सुलाने की साधारण-सी कोशिश के भीतर मां का स्नेह, चिंता, उम्मीद और भावनाओं की पूरी दुनिया समाई हुई महसूस होती है।
एक ही गीत के दो रूप, लेकिन भावनाएं अलग
‘मुक्ति’ के संगीत में इस लोरी के पुरुष और महिला, दोनों संस्करण शामिल किए गए थे। मुकेश की आवाज वाला संस्करण शशि कपूर और बाल कलाकार पिंकी से जुड़े दृश्य के साथ सामने आता है, जबकि लता मंगेशकर की आवाज वाला संस्करण विद्या सिन्हा के किरदार पर फिल्माया गया था। यही वजह है कि एक ही धुन और बोल अलग-अलग भावभूमि में सुनाई देते हैं। एक ओर बच्चे के साथ खुशी और अपनापन है, तो दूसरी ओर मां की भावनाओं में जीवन की परिस्थितियों और मन की बेचैनी की छाया दिखाई देती है।
मुकेश की आवाज ने दी पिता के स्नेह की गर्माहट
मुकेश की गहरी और भावपूर्ण आवाज में रिकॉर्ड किया गया पुरुष संस्करण इस लोरी को पिता के स्नेह से जोड़ता है। शशि कपूर पर फिल्माए गए दृश्य में बच्चे के प्रति अपनापन और दुलार गीत के भाव को और सहज बना देता है। मुकेश की आवाज की खासियत ही यही थी कि उसमें बिना किसी अतिरिक्त नाटकीयता के भावनाओं को श्रोता तक पहुंचाने की क्षमता थी। ‘लल्ला लल्ला लोरी’ में उनकी आवाज बच्चे को सुलाने वाली धुन से आगे बढ़कर पारिवारिक आत्मीयता का एहसास पैदा करती है।
लता मंगेशकर के सुरों ने इसे मां की लोरी बना दिया
लता मंगेशकर के स्वर में यही गीत सुनने पर इसका भाव और अधिक मातृत्वपूर्ण हो जाता है। विद्या सिन्हा पर फिल्माया गया महिला संस्करण मां और बेटी के रिश्ते को केंद्र में लाता है। उनकी मखमली आवाज में लोरी के शब्दों की कोमलता और मां के मन की चिंता दोनों सुनाई देती हैं। यही दो अलग-अलग प्रस्तुतियां इस गीत को केवल एक फिल्मी गाना नहीं रहने देतीं, बल्कि उसे भारतीय परिवारों में पीढ़ियों तक सुनाई देने वाली भावनात्मक स्मृति बना देती हैं।
आनंद बख्शी के शब्दों में बसती है बच्चे की मासूम दुनिया
इस लोरी को अमर बनाने में गीतकार आनंद बख्शी की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। बच्चे की मासूमियत, मां की नजर में उसकी सुंदरता और उसे बुरी नजर से बचाने की सहज इच्छा को उन्होंने बेहद सरल शब्दों में पिरोया। यही सरलता गीत को खास बनाती है, क्योंकि लोरी के लिए भारी-भरकम शब्दों के बजाय ऐसी भाषा चाहिए जो सीधे मन में उतर जाए। बच्चे के लिए गाए जाने वाले इन शब्दों में घर-परिवार की वह आत्मीयता महसूस होती है, जिससे हर पीढ़ी अपने बचपन की कोई न कोई स्मृति जोड़ सकती है।
आर. डी. बर्मन की धुन ने गीत को दी अलग पहचान
आर. डी. बर्मन का संगीत इस गीत की आत्मा है। उन्होंने लोरी के लिए ऐसी सहज और मधुर धुन तैयार की, जो सुनते ही वातावरण को शांत और भावुक बना देती है। गीत की संरचना में किसी बड़े संगीत प्रदर्शन का दिखावा नहीं है, बल्कि उसकी पूरी ताकत उसकी सरलता और भावनात्मक प्रवाह में दिखाई देती है। यही कारण है कि दशकों बाद भी इसके दोनों संस्करण अलग-अलग श्रोताओं को आकर्षित करते हैं और गीत पुरानी फिल्मों के संगीत की याद दिलाने के साथ-साथ आज भी अपनी जगह बनाए हुए है।
क्यों आज भी जुड़ जाता है हर घर इससे
लोरियां किसी एक दौर या पीढ़ी की संपत्ति नहीं होतीं। मां या पिता जब बच्चे को सुलाने के लिए धीमी आवाज में कोई धुन गुनगुनाते हैं, तो उसमें संगीत से कहीं अधिक भावनाएं होती हैं। ‘लल्ला लल्ला लोरी’ की लोकप्रियता का रहस्य भी इसी सहज भाव में छिपा है। इसे सुनने वाले बहुत से लोगों के लिए यह केवल 1977 की एक फिल्म का गीत नहीं, बल्कि बचपन, मां की गोद, घर की रातों और बीते हुए समय की ऐसी याद है जिसे उम्र बढ़ने के बावजूद मन भुला नहीं पाता।
49 साल बाद भी क्यों नहीं पुरानी हुई यह लोरी
‘मुक्ति’ को रिलीज हुए लगभग 49 साल हो चुके हैं, लेकिन इस गीत की लोकप्रियता में समय का असर दिखाई नहीं देता। इसकी वजह केवल प्रसिद्ध गायक, संगीतकार या फिल्म नहीं है, बल्कि वह भावनात्मक सच्चाई है जो गीत के केंद्र में मौजूद है। मुकेश और लता मंगेशकर की आवाज, आर. डी. बर्मन की धुन और आनंद बख्शी के सरल शब्दों का मेल इसे हिंदी फिल्म संगीत की यादगार लोरियों में स्थान देता है। यही कारण है कि ‘लल्ला लल्ला लोरी’ आज भी सुनते ही बचपन की वही दुनिया आंखों के सामने खड़ी कर देती है, जहां मां की गोद सबसे सुरक्षित जगह हुआ करती थी।