भोपाल डेस्क. 25 अप्रैल 1973 को केशवानंद भारती फैसले के ठीक अगले दिन इंदिरा गांधी सरकार ने न्यायमूर्ति एएन रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों को नजरअंदाज कर दिया। ये तीनों न्यायाधीश सरकार के खिलाफ फैसला सुना चुके थे और उन्होंने इस्तीफा दे दिया। कानून मंत्री मोहन कुमारमंगलम ने स्पष्ट रूप से ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ का सिद्धांत रखा जिसमें न्यायाधीश की विचारधारा और दृष्टिकोण को उसकी ईमानदारी से ऊपर रखा जाना चाहिए। आपातकाल के चरम पर 1977 में न्यायमूर्ति एचआर खन्ना के साथ भी वही व्यवहार दोहराया गया। एडीएम जबलपुर मामले में अकेले असहमति जताने वाले खन्ना को मुख्य न्यायाधीश बनाने से रोका गया और उन्होंने इस्तीफा दे दिया। ये घटनाएं दिखाती हैं कि सत्ता के अनुकूल फैसलों को प्राथमिकता दी गई। न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर आज जो चिंता जताई जा रही है, उसका मूल्यांकन इन ऐतिहासिक निर्णयों की पृष्ठभूमि में ही किया जाना चाहिए।
आपातकाल और प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश
1975 से 1977 तक के इक्कीस महीनों में कांग्रेस सरकार ने नागरिक स्वतंत्रताओं को स्थगित कर दिया, प्रेस पर कठोर सेंसरशिप लगाई और राजनीतिक विरोधियों को बिना मुकदमे जेल में डाल दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी उस समय सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया। प्रेस की स्वतंत्रता पर हुआ यह हमला लोकतंत्र के लिए गहरी चोट था। आलोचक कहते हैं कि इन घटनाओं को भुलाकर आज संवैधानिक मूल्यों का रक्षक होने का दावा करना आत्मविस्मृति के समान है। आपातकाल की यादें केवल इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं हैं। वे राजनीतिक संस्कृति और संस्थाओं के प्रति रवैये को समझने का महत्वपूर्ण आईना हैं। जब सत्ता में रहते हुए स्वतंत्र आवाजों को कुचला गया हो तो विपक्ष में आकर संस्थाओं की रक्षा का नैतिक अधिकार स्वतः कमजोर हो जाता है।
अनुच्छेद 356 का राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल
अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग कांग्रेस शासन की एक लगातार प्रवृत्ति रही। 1959 में केरल की चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। 1980 में सत्ता में लौटने के बाद इंदिरा गांधी ने नौ विपक्षी शासित राज्य सरकारों को एक साथ बर्खास्त कर दिया। राज्यपाल के पद को मतदाताओं के जनादेश को पलटने के औजार के रूप में इस्तेमाल करने के आरोप लगे। चुनी हुई सरकारों को इस तरह हटाना लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विपरीत था। आलोचक पूछते हैं कि जब सत्ता में रहते हुए संघीय ढांचे और चुनी सरकारों का सम्मान नहीं किया गया तो आज संस्थाओं की रक्षा का दावा कितना विश्वसनीय है। इतिहास गवाह है कि राजनीतिक सुविधा के लिए संवैधानिक प्रावधानों का इस्तेमाल बार-बार किया गया। यह प्रवृत्ति संस्थाओं को कमजोर करने वाली साबित हुई।
चुनाव आयोग में हस्तक्षेप की दोहरी नीति
अक्टूबर 1989 में आम चुनाव से ठीक एक महीना पहले राजीव गांधी सरकार ने दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्त पद सृजित किए। इसे तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त आरवीएस पेरि शास्त्री को नियंत्रित करने की कोशिश माना गया। चुनाव हारने के बाद दोनों पद कुछ ही हफ्तों में समाप्त कर दिए गए। 1993 में नरसिम्हा राव सरकार ने टीएन शेषन के असुविधाजनक होने पर फिर वही प्रयोग दोहराया। 2009 में यूपीए सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी की औपचारिक आपत्ति के बावजूद नवीन चावला को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया। आलोचक इन घटनाओं को चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर प्रहार बताते हैं। जब सत्ता में रहते हुए आयोग को नियंत्रित करने की कोशिशें हुईं तो आज उसी संस्था की स्वतंत्रता की रक्षा का दावा कितना विश्वसनीय रह जाता है, यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है।
जांच आयोगों और पुरस्कार की परंपरा
1984 के सिख विरोधी दंगों के बाद राजीव गांधी सरकार ने महीनों बाद रंगा नाथ मिश्रा आयोग गठित किया। आयोग ने माना कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने हिंसा में हिस्सा लिया लेकिन इससे आगे कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकाला। बाद में मिश्रा कांग्रेस में शामिल होकर राज्यसभा पहुंचे। आलोचक इसे जांच की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल बताते हैं। सत्ता पक्ष के अनुकूल जांच और उसके बाद पुरस्कार देने की प्रवृत्ति संस्थाओं के प्रति रवैये को उजागर करती है। जब जांच एजेंसियां और आयोग सत्ता के प्रभाव में काम करते दिखें तो उनकी निष्पक्षता पर संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। आज जब संस्थाओं के कैद होने का आरोप लगाया जा रहा है तो अतीत के इन उदाहरणों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
वर्तमान दावों की परीक्षा इतिहास के आईने में
आज कांग्रेस संस्थाओं की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मार्च निकाल रही है और चुनाव आयोग तथा जांच एजेंसियों के कैद होने का आरोप लगा रही है। लेकिन इतिहास पूछता है कि सत्ता में रहते हुए न्यायाधीशों को फैसलों के आधार पर नजरअंदाज करना, प्रेस पर सेंसरशिप लगाना, चुनी सरकारों को बर्खास्त करना, जांच आयोगों को पुरस्कृत करना और चुनाव आयुक्तों के साथ सुविधाजनक व्यवहार—क्या ये अलग-अलग घटनाएं थीं या एक शासन शैली का हिस्सा। संस्थाओं को अपनी इच्छा का विस्तार मानने वाली राजनीति ने लंबे समय तक काम किया। वर्तमान में संस्थाओं पर खतरे के आरोप लगाने वालों को सबसे पहले अपने अतीत के रिकॉर्ड का ईमानदारी से सामना करना होगा। लोकतंत्र में नैतिक अधिकार तभी मजबूत होता है जब शब्द और कर्म में एकरूपता हो। इतिहास के आईने में वर्तमान दावों की परीक्षा अपरिहार्य है।