भारत में शादी को लंबे समय से सोने के गहनों और भव्य रस्मों से जोड़कर देखा जाता रहा है। खासकर दक्षिण भारत और कई पारंपरिक परिवारों में दुल्हन के शरीर पर किलो भर सोना सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। लेकिन अब शहरी और शिक्षित युवाओं का एक वर्ग इस सोच से अलग रास्ता चुन रहा है। उनके लिए शादी दिखावे का मंच नहीं, बल्कि जीवन की नई शुरुआत है। यही वजह है कि कई जोड़े अब सोने के गहनों को या तो पूरी तरह नकार रहे हैं या बेहद सीमित मात्रा में अपना रहे हैं।
दहेज और आर्थिक दबाव के खिलाफ नई पहल
केरल की डैंटल सर्जन डॉ. श्रीकुट्टी सुनील कुमार का फैसला इस बदलाव का बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया। उन्होंने अपनी शादी में सोना न पहनने का निर्णय लेकर यह संदेश दिया कि विवाह को आर्थिक बोझ नहीं बनाना चाहिए। उनका मानना है कि सोने की अनिवार्यता अक्सर दहेज जैसी कुप्रथाओं को बढ़ावा देती है और परिवारों पर भारी वित्तीय दबाव डालती है। उन्होंने पारंपरिक भारी गहनों के बजाय बेहद कम कीमत का अमरीकन डायमंड सेट पहनकर समाज के सामने एक अलग सोच रखी।
‘स्टेटस सिंबल’ नहीं, अब निजी पसंद को मिल रही अहमियत
आज के युवा अपनी पसंद और सहजता को सामाजिक दबाव से ऊपर रखने लगे हैं। कोझिकोड की बासिमा शाना ने अपनी शादी में किराए की ज्वैलरी पहनकर यह साबित किया कि आत्मविश्वास और सादगी किसी भी महंगे गहने से अधिक प्रभावशाली हो सकते हैं। उनके पति ने भी इस फैसले का पूरा समर्थन किया। यही नहीं, कई युवतियां अब यह मानने लगी हैं कि शादी के बाद अलमारी में बंद रहने वाले भारी गहनों पर लाखों रुपये खर्च करना व्यावहारिक नहीं है।
‘लोग क्या कहेंगे’ वाली मानसिकता को चुनौती
भारतीय समाज में शादी केवल दो लोगों का नहीं, बल्कि पूरे परिवार का सामाजिक आयोजन मानी जाती है। ऐसे में ‘नो-गोल्ड’ शादी का फैसला लेना आसान नहीं होता। शुरुआत में कई परिवारों को समाज और रिश्तेदारों की प्रतिक्रियाओं की चिंता रहती है। हालांकि धीरे-धीरे यह मानसिकता बदलती दिख रही है। आईआईटी मद्रास से शोध कर रहीं शारिका रायरथ और उनके पति सिद्धार्थ ने भी सोने की जगह फैशन ज्वैलरी को चुना। परिवार को पहले संकोच हुआ, लेकिन बाद में इसे उनकी व्यक्तिगत पसंद मानकर स्वीकार कर लिया गया।
बढ़ती सोने की कीमतों ने भी बदला नजरिया
सोने के दाम लगातार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रहे हैं। ऐसे में मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए शादी में भारी मात्रा में सोना खरीदना बेहद कठिन होता जा रहा है। कई युवा अब यह मानते हैं कि शिक्षा, घर या भविष्य की वित्तीय सुरक्षा पर निवेश करना ज्यादा समझदारी है, बजाय इसके कि एक दिन के समारोह के लिए लाखों रुपये गहनों पर खर्च किए जाएं। यही कारण है कि ‘नो-गोल्ड वेडिंग’ अब केवल वैचारिक नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी व्यवहारिक विकल्प बनती जा रही है।
समाज में धीरे-धीरे आकार ले रही नई सांस्कृतिक क्रांति
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव अभी सीमित वर्ग तक जरूर है, लेकिन इसका सामाजिक प्रभाव दूरगामी हो सकता है। अगर आने वाले वर्षों में ज्यादा युवा इस दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो शादी से जुड़े अनावश्यक खर्च, कर्ज और सामाजिक दबाव में कमी आ सकती है। यह ट्रेंड भारतीय समाज को दिखावे की संस्कृति से निकालकर जिम्मेदार और संतुलित जीवनशैली की ओर ले जाने वाला कदम माना जा रहा है।