Indore | इंदौर के भागीरथपुरा दूषित पानी कांड को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश पर गठित एक सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट ने जलापूर्ति और सीवरेज व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के अनुसार यह घटना किसी एक दिन की चूक का नतीजा नहीं थी, बल्कि जल और सीवर नेटवर्क की योजना, निगरानी, रखरखाव, शिकायतों पर कार्रवाई और पाइपलाइन बदलने की प्रक्रिया में लंबे समय से चली आ रही कमियों का परिणाम थी। आयोग ने 18 अगस्त 2026 को अपनी रिपोर्ट तीन सीलबंद लिफाफों में हाई कोर्ट में पेश की थी। अदालत के निर्देश के बाद रिपोर्ट को 30 सितंबर को हाई कोर्ट की वेबसाइट पर सार्वजनिक किया गया। रिपोर्ट में पानी की गुणवत्ता, पाइपलाइनों की स्थिति, शिकायतों, अस्पताल रिकॉर्ड, मौतों के कारण, अधिकारियों के बयान और पाइपलाइन बदलने की टेंडर प्रक्रिया समेत कई पहलुओं की जांच की गई।
36 मौतों में 22 को दूषित पानी से जोड़ा
भागीरथपुरा कांड में कुल 36 लोगों की मौत हुई थी। आयोग ने अस्पताल रिकॉर्ड और उपलब्ध जांच के आधार पर इनमें से 22 मौतों को दूषित पानी से फैली बीमारी से संबंधित माना है। बाकी मामलों में मौत का कारण स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं हो सका। रिपोर्ट के मुताबिक इलाके से बड़ी संख्या में लोग उल्टी, दस्त, पेट दर्द, बुखार और डिहाइड्रेशन जैसी शिकायतों के साथ अस्पताल पहुंचे थे। चिकित्सकीय रिकॉर्ड में कई मरीजों में गैस्ट्रोएंटेराइटिस की पुष्टि हुई। जांच आयोग ने उपलब्ध मेडिकल और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर दूषित पानी के सेवन और गैस्ट्रोएंटेराइटिस के बीच संबंध को महत्वपूर्ण माना है।
घटना से पहले ही मिलने लगी थीं शिकायतें
जांच के दौरान सामने आया कि दिसंबर 2025 के अंतिम सप्ताह से ही भागीरथपुरा में उल्टी, दस्त और पेट दर्द के मरीज सामने आने लगे थे। स्थानीय लोगों की ओर से बदबूदार, काले और गंदे पानी की शिकायतें भी की जा रही थीं। रिपोर्ट में बताया गया कि स्थानीय पार्षद की ओर से भी अधिकारियों को शिकायतों की जानकारी दी गई थी। इसके बावजूद समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी।
पानी के सैंपल में E. coli और कोलीफार्म मिला
3 जनवरी 2026 को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पानी के 52 नमूने लिए थे। इनमें से 50 नमूनों में टोटल कोलीफार्म और 40 में E. coli पाया गया। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 29 दिसंबर से 6 फरवरी के बीच लिए गए 24 नमूनों में से 18 असंतोषजनक थे। एमजीएम मेडिकल कॉलेज की जांच में भी 24 में से 19 नमूने पीने योग्य नहीं पाए गए। जांच में 2025 के नगर निगम रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें जांचे गए 73 नमूनों में 54 नमूने मानकों के अनुरूप नहीं पाए गए थे और 39 में फीकल कोलीफार्म की मौजूदगी दर्ज हुई थी।
सीवर और पेयजल लाइन के बीच खतरनाक स्थिति
आयोग की जांच में भागीरथपुरा में कई स्थानों पर सीवर और पेयजल पाइपलाइन के समानांतर, क्रॉसिंग और ओवरलैप होने की स्थिति सामने आई। कुछ स्थानों पर सीवर लाइन पेयजल पाइप के ऊपर भी पाई गई। रिपोर्ट में निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुसार दोनों नेटवर्क के बीच पर्याप्त दूरी रखने और पेयजल पाइप को सीवर लाइन से ऊपर रखने की आवश्यकता का उल्लेख किया गया है। आयोग के मुताबिक सीवर में रिसाव और ओवरफ्लो के साथ पेयजल पाइपलाइन में निगेटिव प्रेशर जैसी परिस्थितियों ने दूषित पानी को पेयजल नेटवर्क में पहुंचने का रास्ता बनाया। नगर निगम के इंजीनियरों के बयानों में भी निर्धारित दूरी का पालन नहीं होने की बात सामने आई।
शिकायतों और रखरखाव व्यवस्था पर भी सवाल
आयोग ने पुराने प्रोजेक्ट की डिजाइन और निर्माण से जुड़े अधिकारियों के साथ जलप्रदाय व्यवस्था के रखरखाव से जुड़े अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की। रिपोर्ट में जर्जर पाइप, रिसाव, नेटवर्क की स्थिति और नियमित रखरखाव की निगरानी को लेकर कमियों का उल्लेख किया गया है। कुछ अधिकारियों के संबंध में आयोग ने यह भी कहा कि उन्हें लीकेज, पाइप क्षति, बदबू और पानी की गुणवत्ता जैसी शिकायतों की जानकारी थी, लेकिन समय पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई।
पाइपलाइन बदलने में हुई लंबी देरी
जांच रिपोर्ट में नई पाइपलाइन बिछाने की टेंडर प्रक्रिया में देरी को भी महत्वपूर्ण कारणों में शामिल किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार टेंडर जारी होने से लेकर एमआईसी तक प्रस्ताव पहुंचने, स्वीकृति और अनुबंध की प्रक्रिया में अलग-अलग स्तर पर देरी हुई। नई पाइपलाइन का काम मई 2024 तक पूरा होना था, लेकिन काम निर्धारित समय से करीब दो साल बाद पूरा हुआ। रिपोर्ट में ठेकेदार एजेंसी और संबंधित अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं।
आयोग ने दिए कई अहम सुझाव
भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए आयोग ने पेयजल और सीवर नेटवर्क को लेकर कई सुझाव दिए हैं। इनमें प्रमुख रूप से:
- पेयजल और सीवर लाइन के बीच पर्याप्त दूरी रखना
- पेयजल लाइन को सीवर से ऊपर रखना
- क्रॉसिंग वाले स्थानों पर प्रोटेक्टिव केसिंग और कंक्रीट शील्डिंग
- पूरे नेटवर्क की GIS मैपिंग
- पुराने पाइपों का चरणबद्ध तरीके से बदलाव
- नियमित सुरक्षा ऑडिट
- रियल टाइम लीकेज और प्रेशर मॉनिटरिंग
- नियमित बैक्टीरियोलॉजिकल जांच
- शामिल हैं।
संदिग्ध पानी की शिकायत पर 24 घंटे में सैंपलिंग
आयोग ने यह भी सिफारिश की है कि अगर किसी क्षेत्र से बदबूदार या संदिग्ध पानी की शिकायत मिलती है तो 24 घंटे के भीतर पानी का सैंपल लिया जाए और लैब जांच कराई जाए। इसके साथ संदिग्ध पाइपलाइन या बोरवेल को बंद करने, जरूरत पड़ने पर टैंकर और सुरक्षित जल केंद्र उपलब्ध कराने, फ्लशिंग व क्लोरीनेशन कराने तथा क्रॉस-कनेक्शन को तुरंत ठीक करने की व्यवस्था का सुझाव दिया गया है।
शहरी जल आपूर्ति प्राधिकरण बनाने की सिफारिश
आयोग ने एक अलग शहरी जल आपूर्ति प्राधिकरण गठित करने की भी सिफारिश की है। इसके अध्यक्ष के रूप में सेवानिवृत्त हाई कोर्ट जज या सेवानिवृत्त मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी की नियुक्ति का सुझाव दिया गया है। इसके अलावा रिपोर्ट में मृतकों के परिवारों और प्रभावित लोगों के लिए आर्थिक सहायता, बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति तथा प्रभावित परिवारों को कुछ वर्षों तक मुफ्त चिकित्सा सुविधा और नियमित स्वास्थ्य शिविर जैसी राहत की सिफारिशें भी की गई हैं।
रिपोर्ट ने व्यवस्था की जवाबदेही पर उठाए सवाल
भागीरथपुरा मामले की जांच का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि आयोग ने इसे किसी एक तत्काल गलती के बजाय लंबे समय से चली आ रही व्यवस्थागत कमियों से जोड़ा है। जलापूर्ति और सीवरेज नेटवर्क की योजना से लेकर रखरखाव, शिकायत निवारण और पाइपलाइन बदलने की प्रक्रिया तक कई स्तरों पर कमियां सामने आने की बात रिपोर्ट में कही गई है। हालांकि, रिपोर्ट में जिन अधिकारियों और एजेंसियों की भूमिका पर टिप्पणियां की गई हैं, उन पर अंतिम कानूनी या प्रशासनिक जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया संबंधित प्राधिकरणों और न्यायिक कार्यवाही के अधीन रहेगी।