मध्य प्रदेश में धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर के अत्यधिक उपयोग से होने वाले ध्वनि प्रदूषण का मामला एक बार फिर हाई कोर्ट पहुंचा है। सुनवाई के दौरान इंदौर खंडपीठ ने राज्य सरकार, पुलिस प्रशासन और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के रवैये पर असंतोष जताया। न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने कहा कि अधिकारी लगातार यह दावा कर रहे हैं कि ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए कार्रवाई की जा रही है, लेकिन इसका असर जमीनी स्तर पर दिखाई नहीं देता। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह प्रशासन की मौजूदा कार्रवाई से संतुष्ट नहीं है।
कोर्ट ने पूछा- कितने लोगों पर कार्रवाई हुई?
सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रशासन से कई अहम सवाल पूछे। कोर्ट ने कहा कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि कार्रवाई की जा रही है। प्रशासन को विस्तृत जानकारी देनी होगी कि अब तक कितने लोगों या संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई की गई, किस कानून के तहत कार्रवाई हुई और उसका क्या परिणाम निकला। युगलपीठ ने यह भी पूछा कि भविष्य में ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए प्रशासन कौन-कौन से प्रभावी कदम उठाने जा रहा है, ताकि आम नागरिकों को राहत मिल सके।
जनहित याचिका में उठाया गया था मामला
यह मामला इंदौर निवासी अमिताभ उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) से जुड़ा है। उनके अधिवक्ता अभिनव धानोतकर ने अदालत में दलील दी कि धार्मिक स्थलों पर तेज आवाज में लाउडस्पीकर बजने से आसपास रहने वाले लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है। याचिका में कहा गया कि सरकार ने ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए नियम तो बनाए हैं, लेकिन उनका पालन नहीं कराया जा रहा। केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि कई वाहनों में भी अत्यधिक तेज आवाज में लाउडस्पीकर बजाए जाते हैं, जिससे ध्वनि प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है।
रात 10 बजे के बाद भी बजते हैं लाउडस्पीकर
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि रात 10 बजे के बाद भी कई धार्मिक स्थलों और खुले स्थानों पर तेज आवाज में धार्मिक एवं अन्य कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। जबकि नियमों के अनुसार निर्धारित समय और तय ध्वनि सीमा से अधिक आवाज में लाउडस्पीकर का उपयोग प्रतिबंधित है। उन्होंने अदालत से मांग की कि पुलिस और जिला प्रशासन को नियमों का सख्ती से पालन कराने के निर्देश दिए जाएं ताकि आम लोगों को राहत मिल सके।
2024 के आदेशों का अब तक नहीं हुआ पालन
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि 27 जुलाई 2024 को हाई कोर्ट ने ध्वनि प्रदूषण को लेकर महत्वपूर्ण आदेश जारी किए थे। इन आदेशों में कहा गया था कि धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर की आवाज 10 डेसीबल या 75 डेसीबल (जो भी कम हो) से अधिक नहीं होनी चाहिए। वहीं निजी स्थानों पर भी निर्धारित सीमा से अधिक ध्वनि की अनुमति नहीं है। हाई कोर्ट ने इन नियमों का पालन सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी जिला कलेक्टर और पुलिस प्रशासन को सौंपी थी।
15 महीने बाद भी नहीं दी गई अनुपालन रिपोर्ट
कोर्ट ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि करीब 15 महीने पहले शासन, पुलिस और प्रशासन से इन आदेशों के पालन की रिपोर्ट मांगी गई थी, लेकिन अब तक कोई विस्तृत रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत नहीं की गई। याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि तेज आवाज में लाउडस्पीकर बजने की शिकायत करने पर कई बार पुलिस फोन तक नहीं उठाती और शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई भी नहीं होती।
अधिकारियों को कोर्ट में किया गया तलब
मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने खजराना जोन के एसीपी आशीष पटेल, मल्हारगंज जोन के एसीपी एएस जादौन तथा मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होने के निर्देश दिए। अधिकारियों ने अदालत को बताया कि ध्वनि प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है। हालांकि कोर्ट ने इस जवाब पर असंतोष जताते हुए कहा कि केवल मौखिक जानकारी पर्याप्त नहीं है। प्रशासन को दस्तावेजों के साथ यह साबित करना होगा कि वास्तव में कितनी कार्रवाई हुई और उसका क्या प्रभाव पड़ा।
ध्वनि प्रदूषण पर क्या कहते हैं नियम?
भारत में Noise Pollution (Regulation and Control) Rules, 2000 के तहत अलग-अलग क्षेत्रों के लिए ध्वनि की अधिकतम सीमा तय की गई है। रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक सार्वजनिक स्थानों पर लाउडस्पीकर के उपयोग पर विशेष प्रतिबंध है। किसी भी धार्मिक, सामाजिक या सार्वजनिक कार्यक्रम में निर्धारित ध्वनि सीमा से अधिक आवाज का उपयोग नियमों का उल्लंघन माना जाता है।हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून सभी के लिए समान है और ध्वनि प्रदूषण के मामलों में नियमों का पालन सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
3 अगस्त को होगी अगली सुनवाई
हाई कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को तय की है। अदालत ने तब तक राज्य सरकार, पुलिस और संबंधित अधिकारियों को विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। रिपोर्ट में अब तक की गई कार्रवाई, दर्ज मामलों की संख्या, संबंधित कानूनों के तहत उठाए गए कदम और भविष्य की कार्ययोजना का पूरा विवरण देना होगा। धार्मिक स्थलों पर बढ़ते ध्वनि प्रदूषण को लेकर हाई कोर्ट की यह टिप्पणी प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश मानी जा रही है। यदि अगली सुनवाई तक संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया तो अदालत इस मामले में और सख्त निर्देश जारी कर सकती है।