मध्यप्रदेश में शिक्षक भर्ती से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने आरक्षित वर्ग के उन शिक्षकों के पक्ष में अहम फैसला सुनाया है, जिन्होंने मेरिट के आधार पर संयुक्त शिक्षक भर्ती में स्थान हासिल किया था। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि जनजातीय कार्य विभाग में पहले से पदस्थ ऐसे योग्य शिक्षकों को स्कूल शिक्षा विभाग के रिक्त पदों के लिए चॉइस फिलिंग का अवसर दिया जाए और उनकी मेरिट के आधार पर पदस्थापना की जाए। कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को दो महीने के भीतर पूरा करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भर्ती प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद उसके बीच में ऐसे बदलाव नहीं किए जा सकते, जिनका असर पहले से चयनित अभ्यर्थियों के अधिकारों पर पड़े। यह मामला खास तौर पर उन आरक्षित वर्ग के शिक्षकों से जुड़ा है, जिन्होंने 2018 की शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी TET के आधार पर हुई संयुक्त शिक्षक भर्ती में बेहतर अंक हासिल किए थे, लेकिन बाद में स्कूल शिक्षा विभाग में खाली पदों के लिए आयोजित काउंसलिंग और चॉइस फिलिंग की प्रक्रिया से उन्हें बाहर कर दिया गया था।
हाईकोर्ट ने सरकार को क्या निर्देश दिए?
जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि जनजातीय कार्य विभाग में पहले से पदस्थ उन शिक्षकों को, जो संबंधित भर्ती में मेरिट के आधार पर चयनित हुए थे, स्कूल शिक्षा विभाग के रिक्त पदों के लिए अपनी पसंद भरने यानी चॉइस फिलिंग का अवसर दिया जाए। इसके बाद पदस्थापना का निर्णय संबंधित शिक्षकों की मेरिट के आधार पर किया जाना है। अदालत ने सरकार को इस पूरी कवायद को अनिश्चित समय तक लंबित रखने के बजाय दो महीने की समयसीमा में पूरा करने को कहा है। इससे उन शिक्षकों को अपने पसंदीदा स्कूल या उपलब्ध पद के लिए अपनी प्राथमिकता दर्ज कराने का अवसर मिलेगा, जिसे वे पहले नहीं पा सके थे।
भर्ती प्रक्रिया के बीच नियम बदलने पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया के नियमों में बीच में बदलाव के मुद्दे को भी महत्वपूर्ण माना। डिवीजन बेंच ने साफ किया कि जब भर्ती प्रक्रिया निर्धारित नियमों के तहत शुरू हो चुकी हो, तब बाद में ऐसे नियम नहीं बदले जा सकते जिनसे चयनित अभ्यर्थियों के अधिकार प्रभावित हों। अदालत का यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि याचिकाकर्ताओं का कहना था कि भर्ती की मूल प्रक्रिया में मेरिट के आधार पर उन्हें नियुक्ति मिली थी, लेकिन बाद में जारी निर्देशों के कारण उन्हें स्कूल शिक्षा विभाग के रिक्त पदों के लिए अपनी पसंद दर्ज करने का मौका ही नहीं दिया गया। यानी विवाद केवल स्कूल चुनने तक सीमित नहीं था, बल्कि भर्ती के दौरान तय प्रक्रिया और बाद में किए गए बदलाव के बीच अंतर को लेकर भी था।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला सिवनी जिले की माध्यमिक स्कूल की शिक्षिका साक्षी ताम्रका समेत 54 शिक्षकों की याचिका से जुड़ा है। इन शिक्षकों ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अपनी शिकायत अदालत के सामने रखी थी। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, वर्ष 2018 की शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) के आधार पर स्कूल शिक्षा विभाग और जनजातीय कार्य विभाग में संयुक्त शिक्षक भर्ती प्रक्रिया आयोजित की गई थी। इस भर्ती में अलग-अलग वर्गों के अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया। याचिका में दावा किया गया कि आरक्षित वर्ग के कई अभ्यर्थियों ने सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों की तुलना में भी अधिक अंक प्राप्त किए थे। मेरिट में बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद उन्हें जनजातीय कार्य विभाग के स्कूलों में पदस्थ किया गया।
मेरिट में आगे रहने के बावजूद ट्राइबल स्कूलों में मिली नियुक्ति
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि संयुक्त शिक्षक भर्ती के दौरान आरक्षित वर्ग के कई शिक्षकों ने अच्छे अंक हासिल किए थे। उनकी मेरिट मजबूत थी और इसी आधार पर उन्हें जनजातीय कार्य विभाग के स्कूलों में नियुक्ति दी गई। बाद में जब स्कूल शिक्षा विभाग में विभिन्न पद खाली हुए तो वहां पदस्थापना के लिए चॉइस फिलिंग और काउंसलिंग की प्रक्रिया शुरू की गई। चॉइस फिलिंग का सीधा मतलब है कि पात्र शिक्षक उपलब्ध रिक्त पदों या स्कूलों में अपनी प्राथमिकता दर्ज कर सकता है। इसके बाद निर्धारित नियमों और मेरिट के आधार पर पदस्थापना की जाती है। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्हें भी इस प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार मिलना चाहिए था।
2022 के निर्देशों से शुरू हुआ विवाद
मामले में सबसे अहम मोड़ नवंबर-दिसंबर 2022 में जारी सरकारी निर्देशों के बाद आया। याचिका के मुताबिक स्कूल शिक्षा विभाग के खाली पदों को भरने के लिए जब काउंसलिंग और चॉइस फिलिंग की प्रक्रिया निर्धारित की गई, तो आरक्षित वर्ग के उन शिक्षकों को इसमें शामिल नहीं किया गया जो मेरिट के आधार पर पहले ही संयुक्त भर्ती में चयनित होकर जनजातीय कार्य विभाग में पदस्थ थे। याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने तर्क रखा कि इससे उन्हें अपनी पसंद के स्कूल में पदस्थापना का अवसर नहीं मिला। उनका आरोप था कि इस व्यवस्था का परिणाम यह हुआ कि कम मेरिट वाले कुछ शिक्षकों को ऐसे स्कूलों में पदस्थापना का अवसर मिल गया, जबकि अधिक अंक वाले शिक्षक अपनी पसंद के स्कूल के लिए दावा ही नहीं कर सके।
चॉइस फिलिंग से बाहर करने पर शिक्षकों ने उठाए सवाल
शिक्षकों की मुख्य आपत्ति यही थी कि जब वे भर्ती प्रक्रिया में मेरिट के आधार पर चयनित हुए और उनकी योग्यता के आधार पर उन्हें नियुक्ति भी मिली, तो बाद की काउंसलिंग में उन्हें बाहर रखने का आधार क्या था। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की कि उन्हें भी स्कूल शिक्षा विभाग के रिक्त पदों के लिए अपनी पसंद दर्ज करने का अवसर दिया जाए। उनका कहना था कि यदि मेरिट को पदस्थापना में महत्व दिया जाता है तो केवल आरक्षित वर्ग से होने के कारण मेरिट में बेहतर प्रदर्शन करने वाले अभ्यर्थियों को चॉइस फिलिंग से बाहर रखना उचित नहीं है। इसी विवाद पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने सरकार को दोबारा प्रक्रिया आयोजित कर संबंधित शिक्षकों को मौका देने के निर्देश दिए हैं।
हाईकोर्ट के फैसले से शिक्षकों को क्या फायदा होगा?
अदालत के निर्देश का सबसे सीधा फायदा उन शिक्षकों को मिलेगा जो संबंधित भर्ती में मेरिट के आधार पर चयनित हुए थे, लेकिन चॉइस फिलिंग की प्रक्रिया में भाग नहीं ले सके थे। अब सरकार को उन्हें स्कूल शिक्षा विभाग में उपलब्ध रिक्त पदों के लिए अपनी प्राथमिकताएं दर्ज कराने का अवसर देना होगा। इसके बाद उनकी मेरिट और उपलब्ध पदों के आधार पर पदस्थापना की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इसका मतलब यह है कि अब संबंधित शिक्षकों को केवल इस आधार पर बाहर नहीं रखा जा सकेगा कि वे पहले से जनजातीय कार्य विभाग में पदस्थ हैं।
मेरिट और आरक्षण को लेकर क्या है अहम बात?
इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आरक्षण और मेरिट को एक-दूसरे से अलग-अलग देखने के बजाय भर्ती प्रक्रिया में दोनों की भूमिका को लेकर सवाल उठे। आरक्षित वर्ग से आने वाले किसी अभ्यर्थी का मेरिट में बेहतर प्रदर्शन होना अपने आप में उसकी योग्यता को दर्शाता है। ऐसे में यदि वह निर्धारित भर्ती प्रक्रिया में चयनित हुआ है, तो बाद में उसकी पदस्थापना से जुड़े अवसर को लेकर अलग नियम लागू करने का मामला विवाद का कारण बन सकता है। हाईकोर्ट ने इसी संदर्भ में भर्ती प्रक्रिया के दौरान नियमों में बदलाव नहीं करने की बात स्पष्ट की है।
दो महीने में पूरी करनी होगी प्रक्रिया
अदालत ने सरकार को केवल चॉइस फिलिंग का अवसर देने तक सीमित निर्देश नहीं दिया है, बल्कि पूरी प्रक्रिया को दो महीने के भीतर पूरा करने की समयसीमा भी निर्धारित की है। अब संबंधित विभाग को पहले पात्र शिक्षकों की पहचान करनी होगी। इसके बाद उपलब्ध रिक्त पदों की जानकारी और चॉइस फिलिंग की प्रक्रिया तय करनी होगी। शिक्षकों की पसंद दर्ज होने के बाद मेरिट के आधार पर पदस्थापना की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इस पूरी प्रक्रिया में प्रशासन के सामने यह सुनिश्चित करने की चुनौती होगी कि कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप सभी पात्र शिक्षकों को समान अवसर मिले।
स्कूल शिक्षा विभाग के खाली पदों पर होगा असर
हाईकोर्ट के इस आदेश का असर स्कूल शिक्षा विभाग के उन रिक्त पदों पर भी पड़ सकता है, जिन पर संबंधित शिक्षकों की पदस्थापना की जानी है। यदि बड़ी संख्या में शिक्षक चॉइस फिलिंग करते हैं तो विभाग को उपलब्ध रिक्तियों, शिक्षक की मेरिट और उनके द्वारा दी गई प्राथमिकता के आधार पर नई पदस्थापनाएं करनी होंगी। इससे कुछ शिक्षकों को मौजूदा पदस्थापना से अलग स्कूल या क्षेत्र में जाने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, अंतिम पदस्थापना उपलब्ध रिक्तियों और सरकार द्वारा तय प्रक्रिया के अनुसार ही होगी।
शिक्षकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि इसमें भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता, मेरिट और नियमों की स्थिरता जैसे मुद्दे सीधे जुड़े हैं। यदि किसी भर्ती के लिए प्रक्रिया और पात्रता के नियम पहले से तय हैं, तो चयन के बाद उनके आधार पर मिलने वाले अवसरों में अचानक बदलाव से अभ्यर्थियों के बीच असमानता की स्थिति पैदा हो सकती है। हाईकोर्ट का निर्देश संबंधित शिक्षकों को दोबारा अपनी पसंद दर्ज कराने का अवसर देता है और इस तरह पहले से चली आ रही विवादित प्रक्रिया को सुधारने की दिशा में कदम माना जा सकता है।