गिनी की राजधानी कोनाक्री में रविवार, 23 अगस्त 2026 की सुबह एक भीषण हादसे ने पूरे इलाके को झकझोर दिया। शहर के सबसे बड़े कचरा डंपिंग स्थल दार-एस-सलाम लैंडफिल में कचरे का विशाल ढेर अचानक धंस गया। भारी बारिश के बाद हुए इस लैंडस्लाइड की चपेट में आसपास बने घर और झोपड़ियां आ गईं। गिनी सरकार के मुताबिक हादसे में अब तक 30 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 6 लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। इसके अलावा 16 लोगों के हल्के रूप से घायल होने की भी जानकारी सामने आई है। हादसे के बाद मौके पर बड़े पैमाने पर बचाव और राहत अभियान शुरू किया गया है। रेस्क्यू टीमें मलबे और कचरे के विशाल ढेर के बीच फंसे लोगों की तलाश कर रही हैं। भारी मशीनों और खुदाई करने वाले उपकरणों की मदद से मलबा हटाया जा रहा है, क्योंकि आशंका है कि कुछ लोग अभी भी कचरे के नीचे दबे हो सकते हैं।
कोनाक्री में आखिर कैसे हुआ इतना बड़ा हादसा?
जानकारी के मुताबिक रविवार तड़के करीब 2 बजे कोनाक्री के बाहरी इलाके में स्थित दार-एस-सलाम क्षेत्र में तेज बारिश के बाद यह हादसा हुआ। लगातार हुई बारिश का पानी कचरे के विशाल ढेर के ऊपर से बहने लगा। इसके बाद कचरे का एक बड़ा हिस्सा अस्थिर होकर नीचे की ओर खिसक गया और आसपास मौजूद बस्तियों को अपनी चपेट में ले लिया। कचरे का ढेर सामान्य मिट्टी के पहाड़ की तरह स्थिर नहीं होता। इसमें प्लास्टिक, जैविक कचरा, धातु और दूसरी तरह की सामग्री लंबे समय तक जमा होती रहती है। जब ऐसे बड़े ढेर में पानी पहुंचता है तो उसका वजन और अस्थिरता दोनों बढ़ सकते हैं। कोनाक्री में हुई घटना में भी भारी बारिश के बाद कचरे के ढेर के धंसने को हादसे की प्रमुख वजह बताया जा रहा है।
दार-एस-सलाम था कोनाक्री का सबसे बड़ा लैंडफिल
जिस जगह यह हादसा हुआ, वह दार-एस-सलाम लैंडफिल के नाम से जाना जाता है और कोनाक्री का सबसे बड़ा खुला कचरा डंपिंग स्थल है। यहां लंबे समय से राजधानी और आसपास के इलाकों से निकलने वाला कचरा जमा किया जाता रहा है। हादसे की गंभीरता इसलिए भी बढ़ गई क्योंकि लैंडफिल के बिल्कुल आसपास लोगों की बस्तियां मौजूद थीं। कचरे का ढेर धंसने के बाद उसका मलबा सीधे इन घरों और अस्थायी ढांचों तक पहुंच गया। सरकारी अधिकारियों के अनुसार इस लैंडफिल को बंद करने की योजना पहले से बनाई जा चुकी थी। सैन्य इंजीनियरिंग बटालियन से जुड़े अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल बाल्डे मामादो बैलो ने बताया कि साइट को रविवार को बंद किया जाना था। यानी जिस दिन डंपिंग साइट को बंद किया जाना था, उसी दिन यहां यह विनाशकारी हादसा हो गया।
हादसे से पहले लोगों को जारी किया गया था नोटिस
हादसे से पहले प्रशासन को लैंडफिल की सुरक्षा को लेकर चिंता थी। आसपास रहने वाले लोगों को इलाके से हटने के लिए नोटिस भी दिए गए थे। सरकार की ओर से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी गई थी, क्योंकि बारिश के मौसम में कचरे के ढेर के धंसने का खतरा माना जा रहा था। कई लोगों ने जगह खाली कर दी थी, लेकिन सभी परिवार वहां से नहीं हटे थे। हादसे के वक्त आसपास अभी भी कई लोग मौजूद थे। इसी वजह से कचरे का ढेर गिरने के बाद बड़ी संख्या में लोग इसकी चपेट में आ गए। सरकार ने अब प्रभावित परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करने की बात कही है, ताकि दोबारा ऐसी स्थिति पैदा न हो।
रेस्क्यू टीमों ने संभाला मोर्चा, मलबे में जारी तलाश
हादसे के तुरंत बाद राहत और बचाव दल मौके पर पहुंचे। विशाल मात्रा में फैले कचरे और मलबे के कारण रेस्क्यू टीमों के सामने काफी मुश्किलें हैं। खुदाई करने वाली मशीनों की मदद से कचरे को हटाया जा रहा है और संभावित रूप से दबे लोगों की तलाश की जा रही है। सरकार ने बताया है कि फंसे लोगों को खोजने, घायलों को चिकित्सा सहायता देने और मृतकों के शवों को निकालने के लिए पर्याप्त मानव संसाधन और उपकरण लगाए गए हैं। हादसे के बाद गिनी के प्रधानमंत्री अमादू ओरी बाह ने भी घटनास्थल का दौरा किया और राहत एवं बचाव अभियान की स्थिति का जायजा लिया।
पहले भी हो चुका है ऐसा हादसा
दार-एस-सलाम लैंडफिल पर कचरे के ढेर के खिसकने की घटना पहली बार नहीं है। इससे पहले भी यहां कचरे के ढेर से जुड़ी घातक दुर्घटना सामने आ चुकी है। रिपोर्टों के अनुसार 2017 में भी इसी स्थल पर एक घातक हादसा हुआ था, जिसमें कई लोगों की जान गई थी। इस पुराने हादसे के बावजूद लैंडफिल के आसपास आबादी बनी रही। यही वजह है कि मौजूदा घटना के बाद कचरा प्रबंधन, शहरी नियोजन और जोखिम वाले इलाकों में बसी आबादी की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
अफ्रीकी देशों में कचरे के पहाड़ क्यों बन रहे हैं?
गिनी की घटना को केवल एक स्थानीय हादसे के रूप में नहीं देखा जा सकता। अफ्रीका के कई तेजी से बढ़ते शहरों में आबादी बढ़ने के साथ कचरे की मात्रा भी बढ़ रही है, जबकि कचरा प्रबंधन का बुनियादी ढांचा उसी गति से विकसित नहीं हुआ है। नतीजा यह होता है कि शहरों के आसपास बड़े खुले डंपिंग ग्राउंड बन जाते हैं। सालों तक कचरा जमा होने के कारण वहां विशाल ढेर तैयार हो जाते हैं। यदि इन जगहों पर उचित वैज्ञानिक तरीके से कचरे का निस्तारण, ढलान नियंत्रण और जल निकासी व्यवस्था नहीं हो, तो बारिश के दौरान स्थिति और खतरनाक हो सकती है। विशेष रूप से भारी बारिश के दौरान पानी कचरे के ढेर में प्रवेश कर सकता है। इससे ढेर का भार बढ़ता है और उसकी संरचना कमजोर हो सकती है। यदि ढलान अस्थिर हो जाए तो अचानक बड़ा हिस्सा नीचे की ओर खिसक सकता है। कोनाक्री की घटना इसी जोखिम की भयावह तस्वीर सामने लाती है।
कचरा डंप के आसपास गरीब बस्तियां क्यों बस जाती हैं?
ऐसे हादसों में एक बड़ी समस्या सिर्फ कचरे का ढेर नहीं, बल्कि उसके आसपास रहने वाली आबादी भी होती है। गरीब परिवारों के लिए शहर के महंगे हिस्सों की तुलना में कचरा डंप के आसपास की जमीन अपेक्षाकृत सस्ती या आसानी से उपलब्ध हो सकती है। इसके अलावा कुछ लोग डंपिंग साइट पर मौजूद प्लास्टिक, धातु और दूसरी उपयोगी चीजें चुनकर अपनी आजीविका चलाते हैं। इस तरह कचरा डंप धीरे-धीरे केवल कचरा जमा करने की जगह नहीं रहता, बल्कि उसके आसपास एक अनौपचारिक बस्ती और आर्थिक गतिविधि भी विकसित हो जाती है। लेकिन यही स्थिति किसी दुर्घटना के समय जानलेवा साबित हो सकती है। कचरे का विशाल ढेर अगर अचानक खिसकता है तो आसपास रहने वाले लोगों के पास सुरक्षित जगह तक पहुंचने का पर्याप्त समय नहीं होता।
गिनी में प्राकृतिक संसाधनों की भरमार, फिर भी गरीबी बड़ी चुनौती
गिनी पश्चिमी अफ्रीका का ऐसा देश है, जिसके पास प्राकृतिक संसाधनों की बड़ी संपदा है। देश में बॉक्साइट के विशाल भंडार हैं और लौह अयस्क सहित अन्य खनिज संसाधन भी मौजूद हैं। इसके बावजूद देश की बड़ी आबादी गरीबी और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझती है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार गिनी में राष्ट्रीय गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली आबादी का हिस्सा 43.7% है। यह आंकड़ा 2018 के उपलब्ध राष्ट्रीय गरीबी आकलन पर आधारित है। गिनी की अर्थव्यवस्था में खनन क्षेत्र की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन खनिज संसाधनों से मिलने वाली आय का फायदा समाज के हर वर्ग तक समान रूप से पहुंचाना अभी भी बड़ी चुनौती है। विश्व बैंक की रिपोर्ट भी इस बात की ओर इशारा करती है कि मजबूत खनन-आधारित आर्थिक वृद्धि के बावजूद गरीबी कम करने पर उसका असर सीमित रहा है।
खनिज संपदा और जमीनी सुविधाओं के बीच अंतर
गिनी की मौजूदा स्थिति एक बड़े विकासात्मक सवाल को सामने लाती है। किसी देश के पास प्राकृतिक संसाधनों की बड़ी मात्रा होना अपने आप में पर्याप्त नहीं है। उस संपदा से मिलने वाले राजस्व को बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, सुरक्षित आवास, सड़क, जल निकासी, स्वच्छता और आधुनिक कचरा प्रबंधन जैसी बुनियादी सुविधाओं में बदलना भी जरूरी है। कोनाक्री का लैंडफिल हादसा इसी अंतर को उजागर करता है। एक ओर देश खनिज संपदा के कारण आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर राजधानी के एक बड़े कचरा डंप के आसपास रहने वाले लोगों को ऐसे जोखिम का सामना करना पड़ा, जिसकी चेतावनी प्रशासन को पहले से थी।
अब आगे क्या होगा?
हादसे के बाद फिलहाल प्राथमिकता मलबे में दबे लोगों की तलाश, घायलों के इलाज और प्रभावित परिवारों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने की है। इसके साथ ही दार-एस-सलाम लैंडफिल को बंद करने और कचरे को दूसरे स्थान पर ले जाने की योजना को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार पहले ही इस साइट को बंद करने का फैसला कर चुकी थी और बारिश के मौसम में यहां खतरे को लेकर चेतावनी भी दी गई थी। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि भविष्य में ऐसे कचरा डंप के आसपास रहने वाले लोगों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी और राजधानी के कचरे के निस्तारण के लिए कौन-सी स्थायी व्यवस्था तैयार होगी।
हादसे ने उठाए कई गंभीर सवाल
गिनी की इस त्रासदी ने कचरा प्रबंधन को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या खतरनाक लैंडफिल के आसपास रहने वाले सभी लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जा सकता था? क्या बारिश से पहले डंपिंग साइट की सुरक्षा जांच पर्याप्त थी? और क्या शहर की बढ़ती आबादी के हिसाब से कचरा निपटाने की व्यवस्था तैयार की गई थी? इन सवालों के जवाब केवल इस हादसे की जिम्मेदारी तय करने के लिए ही जरूरी नहीं हैं, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए भी महत्वपूर्ण होंगे।