मध्य प्रदेश अब केवल ‘टाइगर स्टेट’ की पहचान तक सीमित नहीं रहना चाहता। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रदेश तेजी से देश के सबसे बड़े वाइल्डलाइफ मॉडल के रूप में उभर रहा है। वन्यजीव संरक्षण, जैव विविधता, इको-टूरिज्म और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को साथ जोड़कर सरकार लगातार बड़े फैसले ले रही है। इसी कड़ी में मुख्यमंत्री 10 और 11 मई को कूनो नेशनल पार्क के दौरे पर रहेंगे, जहां वे बोत्सवाना से लाई गई दो मादा चीतों को उनके बाड़े से निकालकर खुले जंगल में मुक्त करेंगे। इसे भारत में चीता पुनर्वास अभियान का बड़ा और ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।
कूनो अब सिर्फ चीता परियोजना नहीं, वैश्विक मॉडल
कूनो नेशनल पार्क आज दुनिया भर के वन्यजीव विशेषज्ञों की नजर में है। ‘प्रोजेक्ट चीता’ की सफलता के बाद यहां चीतों की संख्या 57 तक पहुंच चुकी है। दशकों बाद भारत में चीतों की वापसी ने यह साबित किया है कि वैज्ञानिक प्रबंधन और राजनीतिक इच्छाशक्ति के दम पर विलुप्त प्रजातियों को फिर से बसाया जा सकता है। अब कूनो को ग्लोबल ब्रीडिंग सेंटर के रूप में विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है। इसके अलावा गांधी सागर वाइल्डलाइफ सेंचुरी को चीतों के दूसरे आवास और नौरादेही वाइल्डलाइफ सेंचुरी को तीसरे बड़े चीता लैंडस्केप के रूप में तैयार किया जा रहा है।
रातापानी और माधव टाइगर रिजर्व से बदली तस्वीर
मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. मोहन यादव ने वन्यजीव संरक्षण में कई ऐतिहासिक फैसले लिए। सबसे बड़ा फैसला रातापानी टाइगर रिजर्व को नया टाइगर रिजर्व घोषित करना रहा। यह प्रस्ताव करीब 17 साल से लंबित था, जिसे अब मंजूरी मिली। इस रिजर्व का नाम पुरातत्वविद् विष्णु श्रीधर वाकणकर के नाम पर रखा गया, जिससे संरक्षण को सांस्कृतिक पहचान भी मिली। इसके बाद मार्च 2025 में माधव टाइगर रिजर्व को प्रदेश का 9वां टाइगर रिजर्व घोषित किया गया। यहां मानव और वन्यजीव संघर्ष कम करने के लिए 13 किलोमीटर लंबी सुरक्षा दीवार बनाई जा रही है।
गिद्ध संरक्षण में देश का सबसे बड़ा केंद्र बना एमपी
कभी विलुप्ति के कगार पर पहुंचे गिद्धों की वापसी में भी मध्यप्रदेश देश का नेतृत्व कर रहा है। प्रदेश में इस समय 14 हजार से अधिक गिद्ध मौजूद हैं, जो देश में सबसे ज्यादा हैं। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी और वन विहार के सहयोग से भोपाल के केरवा क्षेत्र में गिद्ध रेस्क्यू सेंटर चलाया जा रहा है। हाल ही में मुक्त किया गया एक गिद्ध उज्बेकिस्तान तक उड़ान भर चुका है, जिसे इस अभियान की बड़ी सफलता माना जा रहा है।
नए अभ्यारण्य और संरक्षण क्षेत्र घोषित
सरकार ने जैव विविधता संरक्षण को मजबूत करने के लिए कई नए संरक्षित क्षेत्र भी बनाए हैं। सागर जिले में बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर वाइल्डलाइफ सेंचुरी घोषित की गई है। इसके अलावा ओंकारेश्वर और जहानगढ़ में नए वन्यजीव अभ्यारण्य बनाए गए हैं। वहीं बैतूल जिले के ताप्ती क्षेत्र को मध्यप्रदेश का पहला कंजर्वेशन रिजर्व घोषित किया गया है। यहां टाइगर, तेंदुआ, बायसन और जंगली कुत्तों जैसी दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं।
घड़ियाल, मगरमच्छ और कछुआ संरक्षण पर फोकस
नेशनल चंबल सेंचुरी दुनिया में घड़ियालों की सबसे बड़ी शरणस्थली मानी जाती है। हाल ही में कूनो नदी में घड़ियाल और कछुए छोड़े गए, जबकि नर्मदा क्षेत्र में मगरमच्छ संरक्षण अभियान भी शुरू किया गया है। इसके साथ ही काजीरंगा से लाए गए जंगली भैंसों को कान्हा टाइगर रिजर्व में बसाने की योजना भी संरक्षण इतिहास का बड़ा कदम मानी जा रही है।
हाथी संरक्षण और मानव संघर्ष कम करने की योजना
राज्य सरकार ने हाथियों के संरक्षण और मानव-हाथी संघर्ष कम करने के लिए 47 करोड़ रुपए से अधिक की योजना को मंजूरी दी है। ‘हाथी मित्र’ योजना, रेडियो टैगिंग, सोलर फेंसिंग और हाथी टास्क फोर्स जैसे कदम लागू किए जा रहे हैं। वन्यजीवों से होने वाली जनहानि पर मुआवजा राशि 8 लाख से बढ़ाकर 25 लाख रुपए तक कर दी गई है।
वाइल्डलाइफ फ्रेंडली इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर
प्रदेश में 5500 करोड़ रुपए की मेगा टाइगर कॉरिडोर परियोजना पर काम जारी है, जिससे कान्हा, बांधवगढ़, पन्ना और पेंच रिजर्व आपस में जुड़ेंगे। वन्यजीवों को सड़क हादसों से बचाने के लिए अंडरपास, ओवरपास और साउंडप्रूफ कॉरिडोर बनाए जा रहे हैं। रातापानी टाइगर रिजर्व के पास 12 किलोमीटर लंबा साउंडप्रूफ कॉरिडोर तैयार किया गया है, जहां वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही के लिए विशेष अंडरपास बनाए गए हैं।
संरक्षण से रोजगार तक
चीता परियोजना, टाइगर रिजर्व और इको-टूरिज्म गतिविधियों से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मध्यप्रदेश अब केवल ‘टाइगर स्टेट’ नहीं, बल्कि देश का सबसे बड़ा समग्र वन्यजीव संरक्षण मॉडल बनकर उभर रहा है।