पांढुर्णा, 12 सितंबर 2026 | मध्य प्रदेश के पांढुर्णा जिले में शुक्रवार को आयोजित प्रसिद्ध गोटमार मेले में परंपरागत पत्थरबाजी ने एक बार फिर सैकड़ों लोगों को घायल कर दिया। पुलिस के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 450 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं, जिनमें 10 की हालत गंभीर बताई गई है। गंभीर घायलों में से तीन को बेहतर इलाज के लिए नागपुर रेफर किया गया है। जाम नदी के दोनों किनारों पर पांढुर्णा और सावरगांव पक्ष के लोग आमने-सामने आए और नदी के बीच लगाए गए झंडे को हासिल करने के लिए एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते रहे। दिनभर चले इस पारंपरिक आयोजन के बाद पलाश के पेड़ पर लगा झंडा उतारकर मां चंडी को अर्पित किया गया और मेला समाप्त हुआ।
5 साल की बच्ची के सिर में गंभीर चोट
मेले की पत्थरबाजी की चपेट में केवल इसमें हिस्सा लेने वाले लोग ही नहीं आए। पुलिस के मुताबिक मेले को देखने पहुंची 5 साल की बच्ची के सिर में गंभीर चोट लगी है। एक 11 वर्षीय बच्ची भी घायल हुई है। दोनों को उपचार उपलब्ध कराया गया। इस घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है कि भारी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद दर्शकों, खासकर बच्चों को पत्थरबाजी वाले क्षेत्र से पर्याप्त दूरी पर रखने के इंतजाम कितने प्रभावी रहे।
450 आधिकारिक, स्थानीय स्तर पर संख्या और ज्यादा
पांढुर्णा के पुलिस अधीक्षक प्रकाश चंद्र परिहार के मुताबिक आधिकारिक रूप से करीब 450 घायलों की जानकारी सामने आई है। हालांकि स्थानीय सूत्र मामूली चोटों को जोड़कर यह संख्या करीब 650 तक बता रहे हैं। पुलिस अंतिम आंकड़ा तैयार कर रही है। कुछ स्थानीय रिपोर्टों में घायलों की संख्या एक हजार से ज्यादा भी बताई गई है। इसलिए फिलहाल पुलिस द्वारा बताए गए 450 से अधिक घायल और 10 गंभीर के आंकड़े को प्राथमिकता देना ज्यादा सुरक्षित है।
700 पुलिसकर्मी, CCTV और Drone के बावजूद जमकर चले पत्थर
गोटमार मेले को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के बड़े इंतजाम किए थे। करीब 700 पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे। निगरानी के लिए 10 CCTV कैमरे और तीन ड्रोन लगाए गए थे। इसके बावजूद जाम नदी के दोनों किनारों पर पत्थरबाजी बेहद तेज रही। घायलों के इलाज के लिए अस्थायी स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ अस्पतालों को भी तैयार रखा गया था। गंभीर रूप से घायल तीन लोगों को नागपुर भेजा गया।
आखिर क्या है गोटमार मेले की परंपरा?
पांढुर्णा का गोटमार मेला सदियों पुरानी स्थानीय परंपरा से जुड़ा है। लोककथा के मुताबिक पांढुर्णा के एक युवक और सावरगांव की युवती के प्रेम प्रसंग से इसकी शुरुआत हुई। कहा जाता है कि दोनों जाम नदी पार कर रहे थे, तभी दोनों गांवों के बीच संघर्ष हुआ और पत्थर चले। बाद में यही घटना परंपरागत मेले के रूप में बदल गई। आज मेले में जाम नदी के बीच पलाश का पेड़ और झंडा लगाया जाता है। पांढुर्णा और सावरगांव के प्रतिभागी झंडे तक पहुंचने की कोशिश करते हुए एक-दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं।
हर साल चोटिल होते हैं सैकड़ों लोग
गोटमार मेले में गंभीर चोटें नई बात नहीं हैं। पिछले वर्षों में भी सैकड़ों लोग घायल हुए हैं। 2025 में ही 900 से ज्यादा लोगों के घायल होने और दर्जनों गंभीर घायलों के अस्पताल पहुंचने की रिपोर्ट सामने आई थी। लगातार बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने के बावजूद परंपरा जारी है। इससे हर साल सुरक्षा और परंपरा के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज हो जाती है।
सुरक्षा पर फिर उठे सवाल
इस बार भी प्रशासन की ओर से बड़ी संख्या में पुलिस, कैमरे, ड्रोन और मेडिकल टीम तैनात की गई थी। इसके बाद भी बच्चों समेत सैकड़ों लोगों के घायल होने ने मेले के स्वरूप और सुरक्षा प्रोटोकॉल पर सवाल खड़े किए हैं। अधिकारियों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सदियों पुरानी परंपरा को कायम रखते हुए लोगों की जान और सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए।