दरसल यह कहानी 20 साल पुरानी 2002 गुजरात दंगे की हैं। 27 फरवरी 2002 को जब साबरमती एक्सप्रेस में गोधरा स्टेशन के पास आग लगा दी गई। इस घटना में अयोध्या से लौट रहे 59 श्रद्धालुओं की मौत हो गई। घटना के चलते गुजरात में दंगे भड़क उठे। दंगों की आग तीन मार्च 2002 को बिलकिस के परिवार तक पहुंच गई। 21 साल की बिलकिस और उसके परिवार के साथ हुई वह घटना आज भी वह भुला नहीं पाए हैं।
कौन है बिलकिस बानो, क्या हुआ था उनके साथ
हम जिस समाज में रहते हैं वहां बलात्कार, पीड़िताओं के लिए आगे बढ़ना, एक आम जिंदगी जीना कितना मुश्किल होता है कि उसके लिए थोड़ी छूट लेकर असंभव शब्द का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। ऐसा ही दर्द गुजरात की रहने वाली बिलकिस बानो ने झेला हैं।
गोधरा स्टेशन पर पिछले दिन की घटना के बाद राज्य में हिंसा भड़कने लगा जिसके बाद बिलकिस दाहोद जिले के राधिकपुर गांव से निकल गई। बिलकिस के साथ उसकी बेटी सालेहा, जो उस समय साढ़े तीन साल की थी, और उसके परिवार के 15 अन्य सदस्य थे। कुछ दिन पहले बकर-ईद के अवसर पर उनके गांव में हुई आगजनी और लूटपाट के डर से वे भाग गए। 3 मार्च 2002 को परिजन छप्परवाड़ गांव पहुंचे। चार्जशीट के मुताबिक उन पर हंसिया, तलवार और लाठियों से लैस करीब 20-30 लोगों ने हमला किया था। हमलावरों में 11 आरोपी युवक भी थे। बिलकिस, उसकी मां और तीन अन्य महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया और उन्हें बेरहमी से पीटा गया। राधिकपुर गांव के मुसलमानों के 17 सदस्यीय समूह में से आठ मृत पाए गए, छह लापता थे।
हमले में केवल बिलकिस, एक आदमी और एक तीन साल का बच्चा बच गया। हमले के बाद कम से कम तीन घंटे तक बिलकिस बेहोश रही। होश में आने के बाद, उसने एक आदिवासी महिला से कपड़े लिए और एक होमगार्ड से मिली जो उन्हें लिमखेड़ा पुलिस स्टेशन ले गया, जहां बिलकिस ने शिकायत दर्ज कराई।
लेकिन जब सिस्टम ही भ्रष्ट हो तो आम जनता क्या ही कर सकता है। इस केस में भी भौतिक तथ्यों को दबाया और उसकी शिकायत का एक विकृत और छोटा संस्करण लिखा। सीबीआई के मुताबिक यहां तक की उन्हें मेडिकल जांच के लिए सरकारी अस्पताल में तब ले जाया गया जब वो गोधरा के राहत कैंप में पहुंची। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद बिलकिस का मामला सीबीआई को जांच के लिए स्थानांतरित कर दिया गया।
जांच में क्या-क्या हुआ
सीबीआई ने मामले की गंभीरता से जांच की जिसमे यह सामने आया कि मारे गए लोगों का पोस्टमॉर्टम तक ठीक से नहीं किया गया था। सीबीआई जांचकर्ताओं ने हमले में मारे गए लोगों के शव निकाले और पाया कि शवों में से किसी में भी खोपड़ी तक नहीं थी। सीबीआई के मुताबिक पोस्टमार्टम के बाद लाशों के सिर काट दिए गए थे, ताकि शवों की शिनाख्त न हो सके।
मामले का ट्रायल शुरू हुआ तो बिलकिस बानो को जान से मारने की धमकी मिलने लगी। इसके बाद ट्रायल को गुजरात के बाहर महाराष्ट्र शिफ्ट कर दिया गया। मुंबई की कोर्ट में छह पुलिस अधिकारियों और एक डॉक्टर समेत कुल 19 लोगों के खिलाफ आरोप दायर हुए। जनवरी 2008 में एक विशेष अदालत ने 11 आरोपियों को दुष्कर्म, हत्या, गैर कानूनी रूप से इकट्ठा होने समेत अन्य धाराओं में दोषी ठहराया गया।
वहीं, बिलकिस की रिपोर्ट लिखने वाले हेड कॉन्स्टेबल को कोर्ट ने आरोपियों को बचाने के लिए गलत रिपोर्ट लिखने का दोषी पाया गया। जबकि, सात अन्य आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। वहीं, एक आरोपी की ट्रायल के दौरान मौत हो गई।
इसके बाद मई 2017 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने सामूहिक दुष्कर्म मामले में 11 लोगों की आजीवन कैद की सजा को बरकरार रखा। वहीं, पुलिसवालों और डॉक्टर समेत बाकी सात लोगों को बरी कर दिया। अप्रैल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को आदेश दिया कि वो बिलकिस को दो हफ्ते के अंदर 50 लाख रुपये मुआवजे के तौर पर दे।
कैसे रिहा हुए दोषी
सभी दोषी 15 साल से अधिक वक़्त तक सज़ा काट चुके थे। इस आधार पर इनमें से एक अभियुक्त राधेश्याम शाह ने सज़ा में रियायत की गुहार लगाई थी। इस मामले के सभी दोषी को भाजपा नीत गुजरात सरकार ने माफी नीति के तहत सजा माफी दे दी जिसके बाद 15 अगस्त को उन्हें गोधरा उप-कारागार से रिहा कर दिया गया।
सरकार के इस कदम की आलोचना करते हुए बिलकिस ने कहा कि ‘इतना बड़ा और अन्यायपूर्ण फैसला’ लेने से पहले किसी ने उनकी सुरक्षा के बारे में नहीं पूछा और नाही उनके भले के बारे में सोचा। उन्होंने गुजरात सरकार से इस बदलने और उन्हें ‘‘बिना डर के शांति से जीने’ का अधिकार देने को कह।
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