ब्रिटेन स्थित एशमोलियन संग्रहालय ने भारत की एक अत्यंत महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर को वापस लौटाने की प्रक्रिया पूरी कर दी है। यह प्रतिमा लगभग पांच सौ वर्ष पुरानी मानी जाती है और तमिलनाडु के एक प्राचीन मंदिर से चोरी होकर विदेश पहुंच गई थी। लंबे समय तक विदेश में सुरक्षित रहने के बाद अब यह दुर्लभ कांस्य प्रतिमा भारत को सौंप दी गई है, जिससे इसे पुनः अपने मूल धार्मिक स्थल पर स्थापित किया जा सकेगा।
संत तिरुमंगई आळवार से जुड़ी श्रद्धा और परंपरा
यह प्रतिमा दक्षिण भारत के महान वैष्णव संत तिरुमंगई आळवार की है, जिन्हें श्रीवैष्णव परंपरा में अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ स्मरण किया जाता है। लगभग 57.5 सेंटीमीटर ऊंची यह प्रतिमा ठोस कांस्य से निर्मित है और मूल रूप से तमिलनाडु के थाडिकोम्बु ग्राम में स्थित सौंदरराज पेरुमल मंदिर में स्थापित थी। सदियों तक यह प्रतिमा वहां आने वाले श्रद्धालुओं की भक्ति और आस्था का केंद्र रही।
नीलामी के माध्यम से विदेश पहुंची प्रतिमा
उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार एशमोलियन संग्रहालय ने वर्ष 1967 में इस प्रतिमा को एक अंतरराष्ट्रीय नीलामी के माध्यम से खरीदा था। उस समय यह एक निजी संग्रह का हिस्सा थी और उसकी वास्तविक उत्पत्ति के बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं थी। इसी कारण यह कई दशकों तक संग्रहालय के संग्रह में सुरक्षित रखी गई।
शोध से उजागर हुआ वास्तविक इतिहास
नवंबर 2019 में एक स्वतंत्र फ्रांसीसी शोधकर्ता ने संग्रहालय को महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की। उन्होंने वर्ष 1957 में ली गई एक तस्वीर का उल्लेख करते हुए बताया कि वही प्रतिमा उस समय थाडिकोम्बु स्थित सौंदरराज पेरुमल मंदिर में स्थापित थी। इस सूचना के सामने आने के बाद संग्रहालय ने मामले की विस्तृत जांच आरंभ की, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि यह प्रतिमा वास्तव में उसी मंदिर की मूल पूजनीय प्रतिमा है।
शिकायत के बाद शुरू हुई आधिकारिक प्रक्रिया
11 फरवरी 2020 को मंदिर के एक कार्यकारी अधिकारी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि मंदिर की मूल प्रतिमा के स्थान पर आधुनिक प्रतिकृति स्थापित कर दी गई है। इसके बाद लंदन स्थित भारत के उच्चायोग ने 3 मार्च 2020 को इस प्रतिमा पर औपचारिक दावा प्रस्तुत किया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुरोध पर संग्रहालय ने कांस्य धातु का वैज्ञानिक परीक्षण कराया, जिससे इसकी उत्पत्ति की पुष्टि हो गई।
औपचारिक समारोह में भारत को सौंपा गया अवशेष
लंदन स्थित इंडिया हाउस में आयोजित एक औपचारिक समारोह के दौरान इस ऐतिहासिक प्रतिमा का भारत को हस्तांतरण किया गया। इस अवसर पर संग्रहालय की निदेशक डॉ. ज़ा स्टर्गिस तथा पूर्वी कला विभाग की प्रमुख प्रोफेसर मलिका कुम्बेरा लैंड्रस सहित कई विद्वान और अधिकारी उपस्थित रहे। संग्रहालय की ओर से कहा गया कि इस महत्वपूर्ण धरोहर को उसके मूल देश में वापस भेजना उनके लिए संतोष और जिम्मेदारी दोनों का विषय है।
सांस्कृतिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
यह घटना केवल एक प्रतिमा की वापसी नहीं बल्कि सांस्कृतिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखी जा रही है। अतीत में भारत की अनेक प्राचीन मूर्तियां और कलाकृतियां अवैध रूप से विदेश पहुंच गई थीं। अब अंतरराष्ट्रीय सहयोग और शोध के माध्यम से उन्हें वापस लाने के प्रयास तेज हो रहे हैं। इस पूरे प्रकरण में तमिलनाडु पुलिस की मूर्ति अन्वेषण इकाई और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
अब यह दुर्लभ कांस्य प्रतिमा पुनः थाडिकोम्बु स्थित सौंदरराज पेरुमल मंदिर में स्थापित किए जाने की तैयारी में है, जहां सदियों से श्रद्धालु इसकी पूजा करते आए हैं।
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