नई दिल्ली/कोलकाता : लोकसभा में वामपंथी उग्रवाद (माओवाद) पर चर्चा के दौरान शुरू हुई सियासी जंग अब 'राष्ट्रवाद' के मूल सिद्धांतों तक पहुँच गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा कम्युनिस्टों की देशभक्ति पर उठाए गए सवालों के बाद, माकपा (CPIM) के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने ऐतिहासिक तथ्यों के साथ पलटवार किया है।
अमित शाह का प्रहार: 'विदेशी प्रेरणा और कमजोर इच्छाशक्ति'
सदन में चर्चा के दौरान अमित शाह ने कांग्रेस और वामपंथियों को एक ही कतार में खड़ा करते हुए गंभीर आरोप लगाए:
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विदेशी जड़ें: शाह ने दावा किया कि कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना १९२५ में रूस से प्रेरित होकर हुई थी, इसलिए वे कभी भारत के हितों की रक्षा नहीं कर सकते।
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दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव: उन्होंने कहा कि माओवाद को खत्म करने के लिए जो साहस चाहिए, वह केवल मोदी सरकार में है।
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उपलब्धियों का हवाला: शाह ने ३७० धारा हटाने और राम मंदिर निर्माण का जिक्र करते हुए पिछली सरकारों को 'मजबूर सरकार' करार दिया।
मोहम्मद सलीम की चुनौती: "कम्युनिस्टों से बड़ा भारतीय कौन?"
पार्टी के मुखपत्र 'मार्क्सवादी पथ' में लिखे एक लेख के जरिए मोहम्मद सलीम ने अमित शाह के 'विदेशी सिद्धांत' की धज्जियां उड़ाई हैं। उन्होंने निम्नलिखित बिंदु रखे:
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पूर्ण स्वराज की मांग: सलीम ने याद दिलाया कि १९२१ के अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में मौलाना हसरत मोहानी और स्वामी कुमारानंद जैसे कम्युनिस्टों ने ही सबसे पहले 'पूर्ण स्वतंत्रता' की मांग की थी, जिसे गांधीजी ने उस समय स्वीकार नहीं किया था।
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त्याग का इतिहास: उन्होंने बताया कि १९४३ में पार्टी के पहले कांग्रेस प्रतिनिधियों की कुल जेल अवधि ४११ वर्ष थी। कल्पना दत्त जैसी क्रांतिकारियों का उदाहरण देते हुए उन्होंने सावरकर और वाजपेयी पर 'माफीनामे' (मुचलका) के जरिए तंज कसा।
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समाज सुधार में भूमिका: तेभागा, तेलंगाना आंदोलन और भूमि सुधारों के जरिए आधुनिक भारत के निर्माण में कम्युनिস্টों की भूमिका को उन्होंने निर्णायक बताया।
"दिल्ली के ए.के. गोपालन भवन या बंगाल के मुजफ्फर अहमद भवन में मार्क्स-लेनिन से ज्यादा रवींद्रनाथ टैगोर की उपस्थिति प्रासंगिक है। हम देशभक्त भी हैं और अंतरराष्ट्रीयतावादी भी।" — मोहम्मद सलीम, राज्य सचिव, CPIM
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बनाम समावेशी राष्ट्रवाद
बहस अब भारतीय संस्कृति की परिभाषा पर टिक गई है:
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RSS पर कटाक्ष: सलीम ने आरएसएस की 'खाकी हाफ पैंट' और 'त्रिशूल संस्कृति' को 'गैर-भारतीय' करार दिया।
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रवींद्रनाथ बनाम सावरकर: जहाँ शाह वामपंथ को रूसी विचारधारा बताते हैं, वहीं सलीम ने रवींद्रनाथ टैगोर और मार्क्स को एक ही कतार में खड़ा करते हुए 'विश्वलोक' (Internationalism) की बात की।
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अमर्त्य सेन का हवाला: लेख के अंत में उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का जिक्र करते हुए कहा कि कोई भी एक विशिष्ट धार्मिक संस्कृति ही एकमात्र भारतीय संस्कृति नहीं हो सकती।
अमित शाह के राजनीतिक आक्रमण और मोहम्मद सलीम के ऐतिहासिक प्रति-आक्रमण ने देश में राष्ट्रवाद की एक नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ भाजपा 'सांस्कृतिक गौरव' को राष्ट्रवाद मानती है, तो दूसरी तरफ वामपंथ इसे 'जनता के अधिकारों और संघर्ष' के चश्मे से देखता है।