बिहार: बिहार की राजनीति में तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से नवनिर्वाचित निर्दलीय विधान परिषद सदस्य (MLC) बंशीधर ब्रजवासी इन दिनों चर्चा का विषय बने हुए हैं। भाजपा को समर्थन देने के उनके फैसले ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। इस फैसले को लेकर राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी शुरू हो गई है। जहां भाजपा इसे अपने बढ़ते राजनीतिक प्रभाव से जोड़कर देख रही है, वहीं विपक्षी दलों ने ब्रजवासी के फैसले पर सवाल उठाए हैं। मामला अब केवल समर्थन देने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मतदाताओं के भरोसे और राजनीतिक निष्ठा से भी जोड़कर देखा जा रहा है। इस बीच भाजपा और जदयू के बीच संभावित खींचतान की चर्चाएं भी सामने आने लगी हैं। ऐसे में ब्रजवासी का यह कदम बिहार की राजनीति में किस तरह का असर डालता है, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।
जदयू उम्मीदवार अभिषेक झा की पोस्ट ने बढ़ाई सियासी चर्चा
बंशीधर ब्रजवासी के भाजपा को समर्थन देने के फैसले के बाद इस मामले में एक और राजनीतिक मोड़ देखने को मिला। तिरहुत स्नातक सीट के चुनाव में ब्रजवासी से हारने वाले जदयू उम्मीदवार अभिषेक झा ने सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट साझा की। उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा, 'मन में कभी-कभी यह सवाल भी उठता है कि क्या मैं अपने ही परिवार के भीतर रचे गए चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह अकेला पड़ गया।' अभिषेक झा के इस बयान को राजनीतिक हलकों में काफी अहम माना जा रहा है। उनके शब्दों को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। कुछ लोग इसे चुनाव के दौरान और उसके बाद की राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि, उन्होंने अपनी पोस्ट में किसी का नाम लेकर सीधे तौर पर आरोप नहीं लगाया है। इसके बावजूद उनके बयान ने भाजपा और जदयू के बीच अंदरूनी समीकरणों को लेकर चर्चा तेज कर दी है।
कौन हैं बंशीधर ब्रजवासी?
बंशीधर ब्रजवासी बिहार के उन नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने राजनीति में आने से पहले शिक्षक समुदाय के बीच अपनी पहचान बनाई। उनका शुरुआती जीवन शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा रहा है। उन्होंने मिथिला विश्वविद्यालय से परास्नातक की पढ़ाई पूरी की है। वर्ष 2005 में उन्होंने शिक्षामित्र के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी। अपने गांव के स्कूल में नियुक्ति मिलने के बाद उन्होंने शिक्षा व्यवस्था और शिक्षामित्रों की समस्याओं को करीब से समझा। इसी दौरान उन्हें महसूस हुआ कि शिक्षामित्रों की सेवा से जुड़ी कई ऐसी समस्याएं हैं, जिनका समाधान जरूरी है। धीरे-धीरे उन्होंने केवल अपनी नौकरी तक सीमित रहने के बजाय पूरे शिक्षक समुदाय के अधिकारों के लिए आवाज उठानी शुरू कर दी। यही सक्रियता आगे चलकर उनकी राजनीतिक पहचान की बुनियाद बनी।
शिक्षामित्रों के अधिकारों के लिए शुरू किया आंदोलन
बंशीधर ब्रजवासी के सार्वजनिक जीवन में शिक्षक आंदोलन की अहम भूमिका रही है। उस समय शिक्षामित्रों की नियुक्ति केवल 11 महीने के लिए की जाती थी। इस व्यवस्था के कारण उन्हें नौकरी की स्थिरता और भविष्य को लेकर कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता था। ब्रजवासी ने इस व्यवस्था में बदलाव की मांग उठाई और शिक्षामित्रों की सेवा को पूर्णकालिक करने की मांग को लेकर अभियान शुरू किया। अपने इस संघर्ष को संगठित रूप देने के लिए उन्होंने प्रारंभिक शिक्षक संघ का गठन किया। वर्ष 2006 में उन्होंने अनशन के जरिए सरकार और संबंधित विभागों तक अपनी मांग पहुंचाने की कोशिश की। उनके आंदोलन में धीरे-धीरे दूसरे शिक्षक भी जुड़ने लगे। समय के साथ ब्रजवासी शिक्षक संगठनों के बीच एक जाना-पहचाना चेहरा बन गए और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर उनकी सक्रियता बढ़ती चली गई।
केके पाठक से टकराव के बाद चली गई थी नौकरी
बंशीधर ब्रजवासी के जीवन में जुलाई 2024 का समय काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ। उस दौरान बिहार के शिक्षा विभाग में तत्कालीन अपर मुख्य सचिव केके पाठक के साथ उनका टकराव चर्चा में आया। इस घटनाक्रम के बाद ब्रजवासी को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी। नौकरी जाने के बाद उनके सामने आगे के रास्ते को लेकर नई चुनौती खड़ी हो गई। हालांकि, उन्होंने शिक्षक हितों से जुड़े मुद्दों को उठाना बंद नहीं किया। इसके बजाय उन्होंने अपने संघर्ष को राजनीतिक मंच तक ले जाने का फैसला किया। शिक्षक समुदाय के बीच पहले से बनी उनकी पहचान ने उन्हें चुनावी मैदान में उतरने का आधार दिया। इसके बाद उन्होंने तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के उपचुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर अपनी किस्मत आजमाई। यही वह मोड़ था, जहां से उनका सफर शिक्षक आंदोलन से आगे बढ़कर सक्रिय राजनीति तक पहुंच गया।
निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विधान परिषद पहुंचे ब्रजवासी
नवंबर 2024 में तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के उपचुनाव में बंशीधर ब्रजवासी निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरे। इस चुनाव में उन्होंने जीत हासिल कर राजनीतिक समीकरणों को चौंका दिया। उनकी जीत को शिक्षक समुदाय के बीच उनकी लोकप्रियता और आंदोलन के दौरान बनाई गई पहचान से जोड़कर देखा गया। विधान परिषद पहुंचने के बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराई। इसके बाद हालिया चुनाव में भी उन्होंने जीत दर्ज की और विधान परिषद में पूर्णकालिक सदस्य के रूप में अपनी जगह बनाई। इस तरह एक शिक्षामित्र के तौर पर करियर शुरू करने वाले ब्रजवासी का सफर राज्य की राजनीति के महत्वपूर्ण सदन तक पहुंच गया। उनकी चुनावी सफलता ने यह भी दिखाया कि शिक्षक समुदाय से जुड़े मुद्दे चुनावी राजनीति में प्रभाव डाल सकते हैं।
भाजपा को समर्थन देने पर क्यों उठ रहे सवाल?
विधान परिषद में जीत के बाद बंशीधर ब्रजवासी का भाजपा को समर्थन देना अब राजनीतिक बहस का प्रमुख मुद्दा बन गया है। भाजपा की ओर से इस फैसले को पार्टी के प्रति बढ़ते समर्थन के तौर पर पेश किया जा रहा है। भाजपा के पूर्वी जिलाध्यक्ष विवेक कुमार ने कहा कि देशभर में भाजपा को लोगों का समर्थन मिल रहा है। उनके मुताबिक, ब्रजवासी का पार्टी के साथ आना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा के साथ जुड़कर ब्रजवासी जनता की समस्याओं को बेहतर तरीके से उठा और उनका समाधान करा सकते हैं। भाजपा इस फैसले को सकारात्मक राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में देख रही है। हालांकि, विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया इससे बिल्कुल अलग है। उनके बयानों से साफ है कि ब्रजवासी के इस राजनीतिक कदम को लेकर बिहार में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है।
राजद और कांग्रेस ने फैसले को बताया मतदाताओं के भरोसे के खिलाफ
ब्रजवासी के भाजपा को समर्थन देने के फैसले पर राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। राजद के पूर्वी जिलाध्यक्ष रमेश गुप्ता ने उनके फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि ब्रजवासी ने शिक्षक समुदाय के आक्रोश और नाराजगी के आधार पर चुनाव में समर्थन हासिल किया था। उनके अनुसार, अब भाजपा को समर्थन देना उन शिक्षकों और प्रबुद्ध मतदाताओं के भरोसे के साथ विश्वासघात जैसा है। वहीं, कांग्रेस के पूर्वी जिलाध्यक्ष अरविंद कुमार मुकुल ने भी ब्रजवासी पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा का साथ देकर ब्रजवासी ने अपना राजनीतिक चेहरा बदल लिया है। कांग्रेस नेता ने इसे मतदाताओं से वादाखिलाफी करार दिया। इस तरह भाजपा जहां उनके फैसले का स्वागत कर रही है, वहीं विपक्ष इसे जनता के जनादेश से जोड़कर सवाल उठा रहा है।
शिक्षक आंदोलन से राजनीति तक का सफर, अब नए समीकरणों पर नजर
बंशीधर ब्रजवासी की राजनीतिक यात्रा कई महत्वपूर्ण पड़ावों से होकर गुजरी है। वर्ष 2005 में शिक्षामित्र के तौर पर शुरुआत करने से लेकर शिक्षक आंदोलन का नेतृत्व करने और फिर विधान परिषद तक पहुंचने का उनका सफर काफी चर्चा में रहा है। शिक्षक समुदाय के अधिकारों के लिए संघर्ष ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई। नौकरी जाने के बाद निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ना और जीत हासिल करना उनके राजनीतिक करियर का बड़ा मोड़ बना। लेकिन अब भाजपा को समर्थन देने के फैसले ने उनके सामने नई राजनीतिक बहस खड़ी कर दी है। एक तरफ भाजपा उनके साथ आने को अपने लिए सकारात्मक संकेत मान रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष उनके फैसले को मतदाताओं के भरोसे से जोड़ रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में ब्रजवासी की राजनीतिक भूमिका और बिहार में भाजपा-जदयू के समीकरणों पर इस फैसले का क्या असर पड़ता है, यह देखना दिलचस्प होगा।