मुंबई - बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुजुर्ग माता-पिता के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि यदि माता-पिता अपनी देखभाल की उम्मीद में अपनी संपत्ति बेटे या किसी अन्य संतान के नाम करते हैं और बाद में उनकी देखभाल नहीं की जाती, तो ऐसे संपत्ति हस्तांतरण (गिफ्ट डीड) को रद्द किया जा सकता है।
हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले को माना सही
मामले की सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाई कोर्ट ने उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें बुजुर्ग माता-पिता द्वारा अपने बेटे के पक्ष में की गई संपत्ति की गिफ्ट डीड को निरस्त कर दिया गया था। अदालत ने कहा कि संपत्ति का हस्तांतरण केवल स्वामित्व बदलने का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे माता-पिता की देखभाल और सम्मान की अपेक्षा भी जुड़ी होती है।
देखभाल का वादा पूरा नहीं हुआ तो रद्द हो सकता है ट्रांसफर
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि माता-पिता इस विश्वास के साथ अपनी संपत्ति संतान को सौंपते हैं कि वह उनकी देखभाल करेगी, लेकिन बाद में यह जिम्मेदारी नहीं निभाई जाती, तो संपत्ति का हस्तांतरण रद्द किया जा सकता है।अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना कानून का उद्देश्य है।
वरिष्ठ नागरिक कानून का हवाला
हाई कोर्ट ने माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 (Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007) के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह कानून बुजुर्गों को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाया गया है। यदि संपत्ति लेने वाला व्यक्ति अपने दायित्वों का पालन नहीं करता, तो संबंधित प्राधिकरण संपत्ति हस्तांतरण को निरस्त कर सकता है।
बुजुर्गों के अधिकारों को मिली मजबूती
अदालत के इस फैसले को वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि संपत्ति प्राप्त करने के बाद माता-पिता की उपेक्षा करने वालों को कानूनी परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन बुजुर्गों के लिए राहत साबित होगा, जो संपत्ति देने के बाद अपने ही परिवार में उपेक्षा का सामना करते हैं।