दिल्ली के सत्य निकेतन क्षेत्र में छात्र आवास के रूप में इस्तेमाल हो रही 5 मंजिला इमारत के ढहने की घटना ने राजधानी में पुराने भवनों की संरचनात्मक सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे में 6 लोगों की मौत हुई और कई अन्य लोग घायल हुए, जिसके बाद राहत और बचाव अभियान चलाया गया। यह इलाका दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर के निकट है और यहां बड़ी संख्या में पुराने आवासीय भवनों को छात्रों के लिए पेइंग गेस्ट और निजी छात्रावासों में बदला गया है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद कहा कि इस त्रासदी के मद्देनजर भवनों की सुरक्षा को लेकर नई और सख्त व्यवस्था तैयार की जा रही है।
संरचनात्मक जांच और सुरक्षा प्रमाणन के बिना नहीं मिलेगी अनुमति
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार दिल्ली नगर निगम के साथ मिलकर ऐसी नीति तैयार कर रही है, जिसके तहत सार्वजनिक उपयोग के लिए संचालित भवनों की नियमित संरचनात्मक जांच और सुरक्षा प्रमाणन अनिवार्य किया जाएगा। इसका दायरा पेइंग गेस्ट आवास, छात्रावास, नर्सिंग होम, स्कूल और अन्य सार्वजनिक गतिविधियों वाले परिसरों तक बढ़ाया जाएगा। मुख्यमंत्री के अनुसार, यदि संबंधित भवन आवश्यक संरचनात्मक जांच और सुरक्षा प्रमाणन प्रस्तुत नहीं करता है तो वहां ऐसी सार्वजनिक सेवाएं या गतिविधियां चलाने की अनुमति नहीं होगी। सरकार का उद्देश्य केवल हादसे के बाद कार्रवाई करना नहीं, बल्कि जोखिम वाले भवनों की पहले से पहचान कर संभावित दुर्घटनाओं को रोकना है।
20, 30 या 40 साल पुराने भवनों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान
नई व्यवस्था के केंद्र में विशेष रूप से पुराने भवनों की संरचनात्मक स्थिति रहेगी, जिनमें समय के साथ बदलाव, अतिरिक्त निर्माण, मरम्मत या उपयोग में परिवर्तन किया गया हो। मुख्यमंत्री ने कहा कि 20, 30 या 40 वर्ष पुराने भवनों को अपनी संरचनात्मक सुरक्षा से संबंधित जांच रिपोर्ट और प्रमाणन उपलब्ध कराना होगा, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि भवन में लोगों का रहना या सार्वजनिक गतिविधियां संचालित करना सुरक्षित है। हालांकि सरकार की प्रस्तावित नीति के विस्तृत मानक और अंतिम नियम अभी तय किए जाने हैं, लेकिन संकेत स्पष्ट हैं कि केवल भवन की उम्र नहीं, उसकी वास्तविक संरचनात्मक क्षमता और सुरक्षा प्रमाणन को सार्वजनिक उपयोग की अनुमति का महत्वपूर्ण आधार बनाया जाएगा।
बेसमेंट में पानी और मरम्मत कार्य की जांच के घेरे में हादसा
सत्य निकेतन में ढही इमारत को लेकर शुरुआती जांच में बेसमेंट में पानी जमा होने, पुराने ढांचे की स्थिति और चल रहे मरम्मत कार्य जैसे पहलुओं की पड़ताल की जा रही है। पुलिस और अन्य जांच एजेंसियां यह भी देख रही हैं कि क्या मरम्मत या निर्माण कार्य ने भवन की संरचनात्मक मजबूती को प्रभावित किया। विभिन्न प्रारंभिक रिपोर्टों में इमारत की उम्र 40 वर्ष से अधिक बताई गई है और उसके उपयोग तथा निर्माण में हुए बदलावों की भी जांच की जा रही है। हालांकि हादसे के वास्तविक और अंतिम कारण का निर्धारण विस्तृत जांच के बाद ही होगा, इसलिए अभी किसी एक कारण को अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं माना जा सकता।
लापरवाही मिलने पर अधिकारियों पर भी होगी कार्रवाई
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने हादसे के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले लोगों और अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का संकेत दिया है। उन्होंने कहा कि किसी भी स्तर पर लापरवाही सामने आने पर दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध भी कार्रवाई की जाएगी। प्रशासनिक जवाबदेही के साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि पुराने आवासीय भवनों में छात्र आवास, पेइंग गेस्ट सुविधाएं और अन्य व्यावसायिक या सार्वजनिक गतिविधियां संचालित करने से पहले भवन की संरचनात्मक क्षमता और अनुमतियों की पर्याप्त जांच हुई थी या नहीं। इसी क्रम में घटना की जांच शुरू कर दी गई है और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।
छात्र सुरक्षा को लेकर सरकार ने दिया भरोसा
सत्य निकेतन जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में छात्र किराये के कमरों, निजी छात्रावासों और पेइंग गेस्ट आवासों में रहते हैं। इसलिए इस हादसे का असर केवल एक भवन तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे सभी इलाकों की सुरक्षा व्यवस्था पर बहस तेज हो गई है जहां पुरानी इमारतों को छात्रों के रहने के लिए उपयोग में लाया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार प्रभावित छात्रों के साथ खड़ी है और यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं कि हादसे के कारण किसी छात्र को अनावश्यक परेशानी न हो। प्रशासन के सामने अब तत्काल राहत और पुनर्वास के साथ-साथ असुरक्षित भवनों की पहचान और भविष्य के लिए प्रभावी निगरानी तंत्र विकसित करने की दोहरी चुनौती है।
नई नीति के बाद बदल सकती है दिल्ली के पुराने भवनों की व्यवस्था
सत्य निकेतन हादसे के बाद प्रस्तावित नीति लागू होने पर दिल्ली में सार्वजनिक उपयोग वाले पुराने भवनों के संचालन के नियम अधिक कठोर हो सकते हैं। विशेष रूप से छात्रावास, पेइंग गेस्ट आवास, नर्सिंग होम, स्कूल और अन्य स्थानों को समय-समय पर अपनी संरचनात्मक सुरक्षा साबित करनी पड़ सकती है। इससे भवन स्वामियों, संचालकों और नगर निकायों की जिम्मेदारी बढ़ेगी तथा मरम्मत, अतिरिक्त मंजिलों, बेसमेंट में बदलाव और उपयोग परिवर्तन जैसे मामलों पर अधिक निगरानी की संभावना बनेगी। सत्य निकेतन की त्रासदी ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि घनी आबादी वाले इलाकों में पुराने भवनों की सुरक्षा को केवल कागजी औपचारिकता नहीं, बल्कि जनजीवन से सीधे जुड़े गंभीर विषय के रूप में देखना होगा।