कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक पहचान और यूनेस्को से सम्मानित दुर्गा पूजा इस वर्ष आर्थिक चुनौतियों से जूझती नजर आ रही है। महालया से पहले ही राज्यभर की पूजा समितियों में बजट को लेकर चिंता बढ़ गई है। आयोजकों का कहना है कि बढ़ती लागत और घटती फंडिंग के कारण इस बार कई बड़े पंडालों को अपने खर्चों में कटौती करनी पड़ सकती है।
विज्ञापन और चंदे में आई कमी
दुर्गा पूजा के आयोजन का बड़ा हिस्सा कॉरपोरेट विज्ञापनों और स्थानीय चंदों पर निर्भर करता है। लेकिन इस साल कई पूजा समितियों का दावा है कि उन्हें पिछले वर्षों की तुलना में काफी कम आर्थिक सहयोग मिल रहा है। इसका असर सीधे तौर पर पंडाल निर्माण, सजावट और सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर पड़ सकता है।
महंगाई ने बढ़ाया आयोजन का खर्च
बांस, कपड़े, बिजली, रंग-रोगन और मजदूरी जैसी जरूरी सामग्रियों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में सीमित बजट के भीतर भव्य आयोजन करना पूजा समितियों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। कई आयोजक अब खर्च कम करने के लिए साधारण थीम और सीमित सजावट का विकल्प चुन रहे हैं।
कॉरपोरेट कंपनियों का बदला रुख
दुर्गा पूजा के दौरान बड़े ब्रांड्स की मौजूदगी हमेशा आकर्षण का केंद्र रही है, लेकिन इस बार कई कंपनियां पारंपरिक प्रचार की बजाय डिजिटल मार्केटिंग पर अधिक फोकस कर रही हैं। इससे पूजा समितियों को मिलने वाली स्पॉन्सरशिप में कमी दर्ज की जा रही है।
कारीगरों और शिल्पकारों पर भी असर
कोलकाता के कुम्हारटोली सहित राज्यभर के मूर्तिकारों और शिल्पकारों पर इस आर्थिक दबाव का असर दिखाई देने लगा है। कई समितियों ने मूर्तियों का आकार छोटा करने और सजावट का बजट घटाने का फैसला लिया है। इससे हजारों कारीगरों की आय प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।
उत्साह बरकरार, उम्मीदें कायम
हालांकि आर्थिक चुनौतियों के बावजूद पूजा समितियों का मानना है कि दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक आत्मा है। आयोजकों को उम्मीद है कि जैसे-जैसे त्योहार करीब आएगा, श्रद्धालुओं का उत्साह और जनसहयोग आयोजन को नई ऊर्जा देगा।