देश में खाद्य सुरक्षा को लेकर स्थिति उतनी सुदृढ़ नहीं दिखती, जितनी दावों में नजर आती है। हालिया आंकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में खाद्य सैंपल गुणवत्ता जांच में असफल हो रहे हैं। विशेष रूप से दूध जैसे दैनिक उपयोग के पदार्थों में उच्च स्तर की मिलावट सामने आना गंभीर चिंता का विषय है। यह स्थिति न केवल स्वास्थ्य के लिए खतरा है, बल्कि उपभोक्ता के विश्वास को भी कमजोर करती है।
वैश्विक रैंकिंग में पिछड़ता भारत
खाद्य गुणवत्ता के वैश्विक सूचकांक में भारत का स्थान काफी पीछे होना यह दर्शाता है कि अभी सुधार की लंबी राह बाकी है। जहां विकसित देशों में खाद्य सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है, वहीं भारत में यह क्षेत्र कई संरचनात्मक चुनौतियों से जूझ रहा है। यह अंतर केवल संसाधनों का नहीं, बल्कि नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन का भी है।
खुले में बिकने वाले उत्पाद बड़ी चुनौती
देश में अधिकांश खाद्य उत्पाद अब भी खुले रूप में बेचे जाते हैं, जिससे उनकी गुणवत्ता पर निगरानी करना कठिन हो जाता है। पैकेजिंग के अभाव में उत्पाद की उत्पत्ति, गुणवत्ता और भंडारण की जानकारी स्पष्ट नहीं होती। यही कारण है कि मिलावटखोरी को बढ़ावा मिलता है और दोषियों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
स्व-घोषणा प्रणाली की कमजोरिया
भारत में कई खाद्य उत्पाद कंपनियों की स्वयं घोषित जानकारी के आधार पर बाजार में पहुंच जाते हैं। इस प्रक्रिया में कई बार प्रयोगशाला जांच से पहले ही उत्पाद बिक्री के लिए उपलब्ध हो जाते हैं। इससे गुणवत्ता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है और उपभोक्ता जोखिम में पड़ जाता है।
निरीक्षण तंत्र पर अत्यधिक दबाव
खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में मानव संसाधनों की कमी एक बड़ी बाधा है। निरीक्षण अधिकारियों पर अत्यधिक कार्यभार होने के कारण नियमित निगरानी प्रभावित होती है। जब एक अधिकारी को हजारों प्रतिष्ठानों की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, तो प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं हो पाता। यह स्थिति मिलावटखोरों के लिए अवसर पैदा करती है।
प्रयोगशाला ढांचे की सीमाए
देश में खाद्य जांच प्रयोगशालाओं की संख्या और उनकी क्षमता अभी भी अपर्याप्त है। बड़ी आबादी के मुकाबले सीमित संसाधनों के कारण जांच प्रक्रिया धीमी और सीमित हो जाती है। इससे दोषियों के खिलाफ समय पर कार्रवाई नहीं हो पाती और मिलावटखोरी का दायरा बढ़ता जाता है।
अन्य देशों से सीखने की आवश्यकता
दुनिया के कई देशों ने कठोर कानून, उन्नत तकनीक और सख्त निगरानी के माध्यम से खाद्य सुरक्षा को मजबूत किया है। डिजिटल ट्रैकिंग, त्वरित कार्रवाई और कड़ी सजा जैसे उपाय वहां मिलावट को रोकने में प्रभावी साबित हुए हैं। भारत को भी इन अनुभवों से सीख लेकर अपने तंत्र को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है।
स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए सख्त कदम जरूरी
खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता केवल एक प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। जब तक निगरानी तंत्र को सुदृढ़, कानूनों को कठोर और जागरूकता को व्यापक नहीं बनाया जाएगा, तब तक मिलावटखोरी पर प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं होगा। यह समय है कि सरकार, उद्योग और समाज मिलकर इस चुनौती का समाधान खोजें।