नई दिल्ली. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने नौंवी कक्षा के कला विषय में व्यापक बदलाव करते हुए ‘मधुरिमा’ नाम से नई पाठ्यपुस्तक तैयार की है। यह पुस्तक शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू होगी और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड सहित सभी राज्यों एवं संघ शासित प्रदेशों में पढ़ाई जाएगी। इस पहल का उद्देश्य नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप छात्रों को भारतीय कला और संस्कृति से गहराई से जोड़ना है।
कला की विविध विधाओं का समावेश
नई पाठ्यपुस्तक में केवल चित्रकला तक सीमित न रहकर दृश्य कला, संगीत, नृत्य और रंगमंच जैसी विभिन्न विधाओं को शामिल किया गया है। इससे छात्रों को कला के बहुआयामी स्वरूप को समझने का अवसर मिलेगा। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की समग्र शिक्षा छात्रों की रचनात्मकता को विकसित करेगी और उन्हें अपनी अभिव्यक्ति के नए आयाम खोजने में मदद करेगी।
ऐतिहासिक धरोहरों से होगा परिचय
पाठ्यक्रम के अंतर्गत छात्रों को भीमबेटका की प्राचीन गुफाओं, सांची के स्तूप, चोल काल और होयसाल काल की चित्रकला व मूर्तिकला के बारे में विस्तार से पढ़ाया जाएगा। इसके माध्यम से विद्यार्थियों को भारतीय कला के विकासक्रम और उसकी ऐतिहासिक गहराई को समझने का अवसर मिलेगा। साथ ही, यह पहल उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बनेगी।
प्राचीन ग्रंथ और मंदिर वास्तुकला भी शामिल
इस नई पहल में नाट्यशास्त्र जैसे प्राचीन ग्रंथों के साथ-साथ कैलाश और उन्नाकोटीश्वर जैसे मंदिरों की कला एवं स्थापत्य शैली का भी अध्ययन कराया जाएगा। इसके अतिरिक्त अजंता की गुफाओं के भित्ति चित्रों को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है, जिससे छात्र प्राचीन भारतीय चित्रकला की उत्कृष्टता को समझ सकें। यह अध्ययन न केवल सैद्धांतिक होगा, बल्कि छात्रों को इन कलाओं के अनुभवात्मक पहलुओं से भी जोड़ेगा।
नटराज मूर्ति पर शोध के लिए प्रेरणा
पाठ्यपुस्तक में कांस्य मूर्तिकला की समृद्ध परंपरा को विशेष स्थान दिया गया है। छात्रों को भारत मंडपम में स्थापित नटराज की मूर्ति पर शोध के लिए प्रेरित किया जाएगा, जिसे लॉस्ट-वैक्स प्रक्रिया के माध्यम से बनाया गया है। इससे उन्हें पारंपरिक शिल्प तकनीकों और उनके वैज्ञानिक पहलुओं की जानकारी प्राप्त होगी, जो भारतीय कला की विशिष्ट पहचान है।
संगीत, विज्ञान और गणित का समन्वय
इस पुस्तक की एक खास विशेषता यह भी है कि इसमें संगीत को विज्ञान और गणित से जोड़कर समझाया गया है। छात्रों को यह बताया जाएगा कि वाद्य यंत्रों के निर्माण में ध्वनि के सिद्धांत कैसे काम करते हैं और इसमें भौतिकी की क्या भूमिका होती है। इस तरह का समन्वय छात्रों को विषयों के बीच संबंध समझने में मदद करेगा और उनकी समग्र बौद्धिक क्षमता को विकसित करेगा।
रचनात्मकता और सांस्कृतिक समझ को मिलेगा बल
एनसीईआरटी की यह पहल शिक्षा के पारंपरिक ढांचे से आगे बढ़कर छात्रों को रचनात्मक, संवेदनशील और सांस्कृतिक रूप से जागरूक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे छात्र न केवल कला को समझेंगे, बल्कि उसे अपने जीवन में आत्मसात भी कर सकेंगे, जो उन्हें एक बेहतर नागरिक बनने में सहायक होगा।