गुजरात के पवित्र सोमनाथ मंदिर में 8 से 11 जनवरी तक चलने वाला ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक गौरव गाथा को समर्पित है। इस पर्व के माध्यम से देश की आध्यात्मिक विरासत, सांस्कृतिक धरोहर और सामाजिक मूल्यों को विविध कार्यक्रमों के जरिए प्रस्तुत किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 जनवरी को इस ऐतिहासिक आयोजन में शामिल होंगे, जो साल भर चलने वाली आध्यात्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों की श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
विध्वंस नहीं, पुनर्जन्म की अमर कहानी
इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने एक विशेष ओप-एड लेख लिखकर सोमनाथ मंदिर के 1,000 वर्ष पुराने इतिहास को भावनात्मक ढंग से याद किया। उन्होंने कहा कि 1026 ईस्वी में पहला बड़ा आक्रमण होने के बावजूद यह मंदिर आज भी अटूट आस्था और आत्मसम्मान का प्रतीक है। मोदी ने लिखा कि ‘सोमनाथ’ नाम सुनते ही भारतीय सभ्यता की अजेय शक्ति और गौरव का एहसास होता है — यह मंदिर उस आत्मबल का प्रतीक है जो कभी हार नहीं मानता।
नेहरू, पटेल और मुंशी का ऐतिहासिक संदर्भ
अपने लेख में प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता के बाद मंदिर के पुनर्निर्माण में सरदार वल्लभभाई पटेल और के.एम. मुंशी की निर्णायक भूमिका को याद किया। उन्होंने इस प्रसंग का भी उल्लेख किया कि 1951 में मंदिर के उद्घाटन के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के शामिल होने पर आपत्ति जताई थी, बावजूद इसके राष्ट्रपति ने भाग लेकर इस ऐतिहासिक क्षण को राष्ट्रीय गरिमा प्रदान की।
अदम्य साहस, अविचल आस्था
मोदी ने सोमनाथ मंदिर को भारतीय सभ्यता की अदम्य आत्मा का सजीव प्रतीक बताया। उन्होंने के.एम. मुंशी की पुस्तक ‘Somnath: The Shrine Eternal’ का उल्लेख करते हुए कहा कि महमूद गजनी के हमले के बाद भी यह मंदिर पुनर्जागरण की प्रेरणा देता रहा। यह गाथा विनाश की नहीं, बल्कि उस साहस और आस्था की है जिसने करोड़ों भारतीयों के मन में स्वाभिमान की ज्योति जलाई रखी।
निष्कर्ष: भारत की आत्मा का महान प्रतीक
सोमनाथ मंदिर केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक अस्मिता, आध्यात्मिक ऊर्जा और ऐतिहासिक दृढ़ता का कालजयी प्रतीक है। ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति इस परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने और भारतीयता की इस शाश्वत कथा को और गहरा करने का अवसर बनेगी।
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