कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सियासत में इस वक्त एक बहुत बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है। साढ़े 15 साल तक जिस तृणमूल कांग्रेस (TMC) में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की बात ही आखिरी फैसला होती थी, आज उसी दल के भीतर उनके नेतृत्व को सबसे बड़ी चुनौती मिल रही है। स्थिति यह हो चुकी है कि अब विधानसभा में ममता और अभिषेक द्वारा तय किए गए 'विपक्ष के नेता' (Leader of Opposition) के नाम को पार्टी के ही बहुमत वाले विधायक सिरे से खारिज करने की तैयारी में हैं। कालीघाट (ममता बनर्जी का निवास) के निर्देशों को ठेंगा दिखाकर अब पार्टी के भीतर ही नारा गूंजने लगा है— "हम ही असली तृणमूल हैं!"
सुद समेत वापस लौट रहा है 10 साल पुराना इतिहास
राजनीति का पहिया हमेशा घूमता है और 2026 में आकर तृणमूल कांग्रेस के लिए इतिहास का यह चक्र बेहद क्रूर साबित हो रहा है। आज से ठीक एक दशक पहले (2016 में), जब कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल थी, तब लोकतांत्रिक परंपराओं को दरकिनार कर तृणमूल ने अपनी ताकत के दम पर कांग्रेस के मानस भुइयां को पीएसी (Public Accounts Committee) का चेयरमैन बना दिया था, जबकि कांग्रेस सुखविलास वर्मा को यह पद देना चाहती थी। आज ठीक 10 साल बाद, वही संसदीय संकट खुद तृणमूल के सामने आकर खड़ा हो गया है।
सुपरफ्लॉप रही कालीघाट की बैठक: 80 में से पहुंचे सिर्फ 19 विधायक
चुनावी नतीजों के बाद ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी ने कालीघाट में विधायक दल की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई थी। इस बैठक में शीर्ष नेतृत्व ने एकतरफा फरमान जारी करते हुए घोषणा की कि विधानसभा में वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय विपक्ष के नेता होंगे। इसके साथ ही नयना बनर्जी और असीमा पात्रा को डिप्टी लीडर और फिरहाद हाकिम को मुख्य सचेतक (Chief Whip) बनाने का ऐलान किया गया।
लेकिन रविवार को जो अंदेशा जताया जा रहा था, वह सच साबित हुआ। ममता बनर्जी की इस बैठक में पार्टी के जीते हुए 80 विधायकों में से केवल 19 विधायक ही पहुंचे। बाकी के 61 विधायकों ने कालीघाट की राह ही नहीं पकड़ी, जिसने यह साफ कर दिया कि आलाकमान अब अपनी ही पार्टी में 'अल्पमत' में आ चुका है।
"कैमार्क स्ट्रीट की कॉर्पोरेट दादागिरी अब और नहीं चलेगी"
पार्टी सूत्रों के हवाले से खबर है कि इन 61 बागी विधायकों के सुर बेहद कड़े हैं। विधायकों का साफ कहना है, "अभिषेक बनर्जी के दफ्तर (कैमार्क स्ट्रीट) की कॉर्पोरेट दादागिरी अब और बर्दाश्त नहीं की जाएगी।" उनका मानना है कि बिना किसी चर्चा या लोकतांत्रिक प्रक्रिया के ऊपर से फैसले थोपने की 'हाईकमांड संस्कृति' को अब खत्म करने का समय आ गया है।
शोभनदेव चट्टोपाध्याय के पद पर मंडराया खतरा, विधानसभा में दिखेगा असली ड्रामा
इस आंतरिक विद्रोह का पहला असर शोभनदेव चट्टोपाध्याय के पद पर पड़ने वाला है। जैसे ही विधानसभा का सत्र शुरू होगा, ये 60 से अधिक बागी विधायक ममता-अभिषेक के फैसले का खुलकर विरोध कर सकते हैं। संसदीय नियमों के तहत, यह बहुमत वाला गुट स्पीकर के सामने विपक्ष के नेता के तौर पर किसी वैकल्पिक और नए नाम का प्रस्ताव रख सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो यह ममता और अभिषेक बनर्जी के चेहरे पर एक बहुत बड़ा राजनीतिक तमाचा होगा छब्बीस (2026) के इस बड़े सियासी झटके ने साफ कर दिया है कि तृणमूल कांग्रेस पर ममता बनर्जी की पकड़ पूरी तरह ढीली हो चुकी है। अब देखना यह है कि संख्या बल का यह खेल आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति को किस मोड़ पर ले जाता है।