लंबे समय तक दुनिया में सबसे बड़ा चावल उत्पादक चीन रहा, लेकिन अब भारत ने इस रिकॉर्ड को तोड़ दिया। यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर (USDA) की दिसंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में चावल उत्पादन बढ़कर 152 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंच गया, जबकि चीन का उत्पादन 146 मिलियन मीट्रिक टन ही रहा। इस उपलब्धि के साथ भारत न सिर्फ उत्पादन में शीर्ष पर है, बल्कि वैश्विक चावल आपूर्ति में भी अग्रणी बन गया है।
ताइवान की भूमिका और हाइब्रिडाइजेशन का योगदान
भारत में चावल की खेती प्राचीन काल से होती रही है, लेकिन 1960 के दशक में खाद्यान्न संकट के दौरान ताइवान ने भारत को ‘ताइचुंग नेटिव-1’ (TN-1) किस्म उपलब्ध कराई। इसके बाद 1968 में आईआर-8 किस्म आई। भारतीय वैज्ञानिकों ने इन पर हाइब्रिडाइजेशन की प्रक्रिया अपनाई, जिससे उच्च उत्पादन क्षमता वाली नई किस्में विकसित हुईं। यह वैज्ञानिक पहल भारत को आत्मनिर्भर बनाकर वैश्विक स्तर पर चावल उत्पादन में अग्रणी बन गई।
चावल सिर्फ खाद्य नहीं, रणनीतिक साधन भी
जाने-माने एग्रोनॉमिस्ट डॉ. सुधांशु सिंह के अनुसार, भारत का विश्व में सबसे बड़ा चावल उत्पादक बनना केवल कृषि सफलता नहीं है। यह रणनीतिक उपलब्धि भी है। भारतीय चावल आज 172 देशों में निर्यात हो रहा है, जो भारत की विदेश नीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्व को और बढ़ाता है।
निर्यात से विदेशी मुद्रा में रिकॉर्ड योगदान
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने कृषि उत्पादों के निर्यात से 4,50,840 करोड़ रुपए कमाए, जिसमें चावल की हिस्सेदारी लगभग 24% रही। सिर्फ बासमती और गैर-बासमती चावल से 1,05,720 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा आय हुई। इस उपलब्धि ने भारतीय अर्थव्यवस्था में चावल के महत्व को स्पष्ट रूप से दिखाया और यह आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी मजबूती प्रदान करता है।
भविष्य की संभावनाएँ और वैश्विक नेतृत्व
भारत ने चावल उत्पादन में अग्रणी होकर केवल रिकॉर्ड तोड़ा ही नहीं, बल्कि भविष्य में खाद्यान्न सुरक्षा और वैश्विक बाजार में अपनी भूमिका को और मजबूत किया है। नई तकनीकें, उन्नत किस्में और निर्यात नेटवर्क देश को सतत वैश्विक नेता बनाए रखेंगे। इसके साथ ही भारत के किसानों के लिए लाभ और रोजगार के अवसर भी लगातार बढ़ेंगे।
Comments (0)