तमिलनाडु. विजय की पार्टी TVK तमिलनाडु की राजनीति में तेजी से उभरती ताकत बनकर सामने आई है, लेकिन सरकार गठन के निर्णायक मोड़ पर पार्टी की रणनीति ही उसके लिए मुश्किल का कारण बन गई। राजनीतिक विश्लेषक एस गुरुमूर्ति के अनुसार विजय को सबसे पहले राज्यपाल के सामने सबसे बड़ी पार्टी होने के आधार पर अकेले दावा पेश करना चाहिए था, लेकिन गठबंधन स्वरूप में दावा करने से पूरा मामला तकनीकी रूप से उलझ गया।
कांग्रेस के समर्थन पत्र ने बदला पूरा राजनीतिक समीकरण
गुरुमूर्ति का कहना है कि विजय की ओर से कांग्रेस के समर्थन पत्र को भी सरकार गठन के दावे के साथ जोड़ दिया गया, जिससे यह मामला एकल दल की बजाय गठबंधन सरकार के दावे में बदल गया। इसी कारण राज्यपाल को स्पष्ट बहुमत साबित करने के लिए समर्थन देने वाले विधायकों की पूरी सूची मांगनी पड़ी। विश्लेषकों के अनुसार यदि दावा केवल सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर किया जाता, तो स्थिति विजय के पक्ष में अधिक मजबूत रह सकती थी।
बहुमत के आंकड़े में फंसा TVK का गणित
तमिलनाडु विधानसभा के 232 सदस्यीय सदन में बहुमत के लिए आवश्यक संख्या को लेकर भी स्थिति पेचीदा बन गई। गुरुमूर्ति के मुताबिक विजय ने 120 विधायकों के समर्थन का दावा किया, लेकिन दस्तावेजों में केवल 116 विधायकों का समर्थन ही दिखाई दिया। ऐसे में यह संख्या स्पष्ट बहुमत से कम मानी गई और सत्ता गठन का दावा कमजोर पड़ गया। यही वजह रही कि राज्यपाल के सामने संवैधानिक स्थिति जटिल हो गई।
‘गठबंधन सरकार’ की छवि ने बढ़ाई तकनीकी चुनौती
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि कांग्रेस बिना शर्त समर्थन देने के बजाय सरकार में भागीदारी चाहती थी। गुरुमूर्ति ने इसे पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी तकनीकी गलती बताया। उनके अनुसार समर्थन पत्रों की प्रस्तुति इस तरह हुई कि मामला सीधे गठबंधन सरकार के रूप में दिखाई देने लगा। इससे राज्यपाल के लिए यह आवश्यक हो गया कि वे हर सहयोगी दल का स्पष्ट और लिखित समर्थन सुनिश्चित करें।
राज्यपाल की भूमिका पर भी छिड़ी बहस
तमिलनाडु में जारी सियासी संकट के बीच राज्यपाल की भूमिका पर भी चर्चा तेज हो गई है। हालांकि गुरुमूर्ति का मानना है कि संवैधानिक दृष्टि से राज्यपाल ने कोई गलत कदम नहीं उठाया। उनके अनुसार जब दावा गठबंधन के रूप में प्रस्तुत किया गया, तब राज्यपाल के पास बहुमत का स्पष्ट प्रमाण मांगने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। राजनीतिक जानकार इसे संवैधानिक प्रक्रिया और राजनीतिक रणनीति के टकराव के रूप में देख रहे हैं।
पर्दे के पीछे तेज हुई राजनीतिक सौदेबाजी
तमिलनाडु की राजनीति में इस समय लगातार जोड़तोड़ और बातचीत का दौर जारी है। कई छोटे दल सार्वजनिक रूप से समर्थन का संकेत दे रहे हैं, लेकिन लिखित समर्थन देने से बच रहे हैं। कुछ दलों के भीतर मतभेद की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं। ऐसे में छोटे सहयोगी दलों की भूमिका अचानक बेहद अहम हो गई है और सत्ता की तस्वीर हर घंटे बदलती दिखाई दे रही है।
क्या अभी भी मुख्यमंत्री बन सकते हैं विजय?
सभी राजनीतिक उलझनों के बावजूद गुरुमूर्ति का मानना है कि विजय के लिए अभी भी रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। उनका कहना है कि कांग्रेस और वामपंथी दल अंतिम समय में पीछे हटने का जोखिम शायद नहीं उठाएंगे। यदि विपक्षी खेमे से कुछ विधायक टूटते हैं या समर्थन का समीकरण बदलता है, तो विजय सरकार बनाने की स्थिति में आ सकते हैं। इसी कारण तमिलनाडु की राजनीति में असमंजस और उत्सुकता दोनों बनी हुई हैं।
DMK और AIADMK के समीकरणों पर भी बढ़ी चर्चा
DMK और AIADMK के संभावित राजनीतिक समीकरणों को लेकर भी अटकलें तेज हो गई हैं। गुरुमूर्ति ने संकेत दिए कि दोनों दल बदलते राजनीतिक हालात में नए विकल्प तलाश रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यदि ऐसा हुआ, तो यह तमिलनाडु की राजनीति में लंबे समय बाद सबसे बड़ा सत्ता परिवर्तनकारी मोड़ साबित हो सकता है।