हिंदू पंचांग के अनुसार 17 मई 2026 से प्रारंभ हुआ अधिकमास 15 जून 2026 को समाप्त हो रहा है। अधिकमास को धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना जाता है, लेकिन इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य मांगलिक संस्कारों को करने की परंपरा नहीं होती। अब अधिकमास के समापन के बाद 21 जून 2026 से एक बार फिर विवाह सहित सभी शुभ कार्यों का सिलसिला शुरू हो जाएगा। लंबे समय से विवाह की तैयारियों में जुटे परिवारों के लिए यह राहत भरी खबर है, क्योंकि कई लोगों ने शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा में अपने कार्यक्रम स्थगित कर रखे थे। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार आगामी सप्ताहों में विवाह योग्य तिथियों की अच्छी उपलब्धता रहेगी, जिससे विवाह समारोहों की रौनक एक बार फिर बढ़ने की उम्मीद है।
क्यों विशेष माना जाता है अधिकमास?
सनातन परंपरा में अधिकमास को भगवान विष्णु को समर्पित माह माना गया है। इसे पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि यह कालखंड भक्ति, साधना, जप, तप, दान और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत फलदायी होता है। यही कारण है कि इस दौरान व्यक्ति सांसारिक उत्सवों और नए मांगलिक कार्यों की बजाय धार्मिक अनुष्ठानों पर अधिक ध्यान देता है। मान्यता है कि अधिकमास में किए गए पुण्य कर्म कई गुना अधिक फल प्रदान करते हैं। इसी धार्मिक परंपरा के कारण विवाह जैसे नए जीवन की शुरुआत से जुड़े संस्कार इस अवधि में नहीं किए जाते और शुभ कार्यों के लिए अधिकमास समाप्त होने की प्रतीक्षा की जाती है।
21 जून से फिर शुरू होगा विवाह समारोहों का दौर
अधिकमास समाप्त होने के बाद विवाह योग्य मुहूर्तों की शुरुआत 21 जून से होगी। इसके साथ ही विवाह स्थल, बैंक्वेट हॉल, होटल, कैटरिंग सेवाएं, सजावट व्यवसाय और अन्य आयोजन उद्योगों में भी गतिविधियां तेज होने की संभावना है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार जून और जुलाई के महीनों में कुल 12 प्रमुख शुभ तिथियां उपलब्ध हैं, जिन पर बड़ी संख्या में विवाह संपन्न हो सकते हैं। विवाह सीजन के दोबारा शुरू होने से बाजारों में भी उत्साह देखने को मिलेगा, क्योंकि कपड़े, आभूषण, उपहार और सजावट से जुड़े कारोबारों में मांग बढ़ने की संभावना है।
विवाह मुहूर्त का धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व
हिंदू संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं बल्कि दो परिवारों और दो कुलों का पवित्र मिलन माना जाता है। इसलिए विवाह संस्कार को शुभ ग्रह-नक्षत्रों और अनुकूल ज्योतिषीय योगों में संपन्न करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार उचित मुहूर्त में संपन्न विवाह से दांपत्य जीवन में प्रेम, सामंजस्य, समृद्धि और स्थिरता बनी रहती है। विवाह मुहूर्त निर्धारित करते समय तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण तथा ग्रहों की स्थिति का विस्तृत अध्ययन किया जाता है। इसके साथ ही वर और वधू की जन्म कुंडली का मिलान भी महत्वपूर्ण माना जाता है ताकि वैवाहिक जीवन सुखद और संतुलित रह सके।
मुहूर्त चुनते समय किन बातों का रखा जाता है ध्यान?
विशेषज्ञों के अनुसार केवल पंचांग में उपलब्ध शुभ तिथि ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि विवाह के लिए व्यक्तिगत ज्योतिषीय परिस्थितियों का भी ध्यान रखना आवश्यक होता है। वर-वधू की जन्मपत्रिका, ग्रह दशा, नाड़ी, गुण मिलान, भकूट और गण जैसे तत्वों का विश्लेषण कर अंतिम मुहूर्त निर्धारित किया जाता है। कई बार किसी तिथि को सामान्य रूप से शुभ माना जाता है, लेकिन व्यक्तिगत कुंडली के आधार पर वह किसी विशेष जोड़े के लिए उपयुक्त नहीं होती। इसलिए विवाह की तिथि तय करने से पहले योग्य ज्योतिषाचार्य से परामर्श लेने की परंपरा आज भी व्यापक रूप से प्रचलित है।
विवाह उद्योग और अर्थव्यवस्था को भी मिलेगा बढ़ावा
विवाह सीजन की वापसी केवल सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसका आर्थिक प्रभाव भी व्यापक होता है। विवाह समारोहों से जुड़े होटल, बैंक्वेट हॉल, ट्रैवल एजेंसियां, फूल व्यवसाय, वस्त्र उद्योग, आभूषण बाजार और खानपान सेवाओं को इससे बड़ा लाभ मिलता है। अधिकमास के दौरान मांग में आई सुस्ती के बाद अब इन क्षेत्रों में गतिविधियां तेज होने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि जून और जुलाई के शुभ मुहूर्तों के दौरान देशभर में हजारों विवाह समारोह आयोजित होंगे, जिससे स्थानीय बाजारों और सेवा क्षेत्र को भी नई गति मिलेगी।