मानव सभ्यता सदियों से लंबी आयु और युवावस्था को बनाए रखने के तरीकों की तलाश करती रही है। आधुनिक चिकित्सा ने कई गंभीर बीमारियों पर नियंत्रण पाया है, लेकिन उम्र बढ़ने की प्राकृतिक प्रक्रिया अब तक विज्ञान के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई थी। अब अमेरिकी जैव-प्रौद्योगिकी कंपनी लाइफ बायोसाइंसेज़ ने इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए दुनिया का पहला "पार्शियल सेलुलर रीप्रोग्रामिंग" क्लीनिकल ट्रायल शुरू किया है। इस ट्रायल के तहत पहली बार एक मानव मरीज को ईआर-100 नामक प्रायोगिक जीन थेरेपी दी गई है। वैज्ञानिक समुदाय इस अध्ययन को केवल एक चिकित्सा परीक्षण नहीं, बल्कि उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को समझने और संभावित रूप से नियंत्रित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मान रहा है।
पहली बार इंसान को कैसे दी गई यह प्रायोगिक थेरेपी?
इस शुरुआती अध्ययन के लिए उन मरीजों को चुना गया है जो ग्लूकोमा यानी काला मोतिया और उम्र बढ़ने से जुड़ी दृष्टि हानि का सामना कर रहे हैं। ट्रायल के पहले चरण में मरीज की एक आंख में सीधे जीन थेरेपी इंजेक्ट की गई है। अमेरिका के बोस्टन, न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स और चार्ल्सटन जैसे प्रमुख चिकित्सा केंद्रों में सीमित संख्या में मरीजों को शामिल किया गया है। उपचार के बाद मरीजों को विशेष एंटीबायोटिक दवाएं दी जा रही हैं, जो शरीर के भीतर मौजूद उपचारात्मक जीनों को सक्रिय करने का कार्य करती हैं। वैज्ञानिकों का उद्देश्य पहले इसकी सुरक्षा और संभावित दुष्प्रभावों का आकलन करना है, इसलिए मरीजों की कई महीनों तक लगातार निगरानी की जाएगी।
क्या है उम्र को पीछे ले जाने वाली वैज्ञानिक अवधारणा?
इस प्रयोग की वैज्ञानिक नींव हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध आनुवंशिकी वैज्ञानिक डेविड सिंक्लेयर की "इन्फॉर्मेशन थ्योरी ऑफ एजिंग" पर आधारित है। इस सिद्धांत के अनुसार उम्र बढ़ने का मुख्य कारण केवल कोशिकाओं का क्षय नहीं, बल्कि उनके भीतर मौजूद जैविक निर्देशों का धीरे-धीरे अव्यवस्थित हो जाना है। समय के साथ कोशिकाएं उन आनुवंशिक संकेतों को सही ढंग से पढ़ने और लागू करने की क्षमता खोने लगती हैं, जिससे शरीर के विभिन्न अंगों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। ईआर-100 थेरेपी का लक्ष्य इन खोए हुए जैविक निर्देशों को फिर से सक्रिय करना है ताकि कोशिकाएं अपने युवा स्वरूप की तरह कार्य कर सकें। यदि यह सिद्धांत मानव शरीर में सफल साबित होता है तो यह उम्र संबंधी अनेक बीमारियों के उपचार का नया रास्ता खोल सकता है।
‘पार्शियल रीप्रोग्रामिंग’ आखिर कैसे करती है काम?
वैज्ञानिकों ने पाया कि यदि किसी कोशिका को पूरी तरह रीसेट कर दिया जाए तो वह अपनी मूल पहचान खो सकती है और स्टेम सेल जैसी स्थिति में पहुंच सकती है। इससे अनियंत्रित कोशिका वृद्धि और कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है। इसी खतरे को कम करने के लिए "पार्शियल रीप्रोग्रामिंग" तकनीक विकसित की गई है। इसमें कोशिका को पूरी तरह रीसेट नहीं किया जाता, बल्कि उसकी जैविक उम्र को कुछ चरण पीछे ले जाने का प्रयास किया जाता है। इससे कोशिका अपनी मूल पहचान और कार्यक्षमता बनाए रखते हुए अधिक युवा अवस्था की तरह व्यवहार कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संतुलित दृष्टिकोण भविष्य में सुरक्षित एंटी-एजिंग उपचार विकसित करने का आधार बन सकता है।
आंख को ही परीक्षण के लिए क्यों चुना गया?
वैज्ञानिकों ने इस महत्वाकांक्षी प्रयोग के लिए आंख को सबसे उपयुक्त अंग माना है। आंख शरीर का अपेक्षाकृत पृथक और नियंत्रित हिस्सा होती है, जहां उपचार के प्रभाव और संभावित दुष्प्रभावों की निगरानी अपेक्षाकृत आसान होती है। इसके अलावा दृष्टि हानि जैसी समस्याओं में उपचार के परिणामों को भी अधिक स्पष्ट रूप से मापा जा सकता है। पूर्व में चूहों और बंदरों पर किए गए अध्ययनों में इसी तकनीक ने क्षतिग्रस्त दृष्टि तंत्रिकाओं की कार्यक्षमता में सुधार दिखाया था। यही कारण है कि मानव परीक्षण की शुरुआत भी नेत्र रोगों से की गई है।
क्या सचमुच मौत को मात देने के करीब पहुंच गया विज्ञान?
हालांकि इस तकनीक को लेकर उत्साह बहुत अधिक है, लेकिन वैज्ञानिक स्वयं अभी बेहद सावधानी बरत रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह दावा करना जल्दबाजी होगी कि यह उपचार इंसानों को अमर बना देगा या मृत्यु को पराजित कर देगा। वर्तमान ट्रायल का मुख्य उद्देश्य केवल सुरक्षा और प्रारंभिक प्रभावों का मूल्यांकन करना है। यदि आने वाले वर्षों में यह तकनीक सफल रहती है तो उम्र बढ़ने से जुड़ी बीमारियों, दृष्टि हानि, तंत्रिका क्षय और अन्य अनेक स्वास्थ्य समस्याओं के उपचार में बड़ी प्रगति संभव हो सकती है। फिलहाल यह विज्ञान की एक रोमांचक शुरुआत है, जिसने मानव जीवन की सीमाओं को लेकर नई बहस और नई उम्मीदें जरूर पैदा कर दी हैं।