दुनिया इस समय युद्धों, भू-राजनीतिक तनावों और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रही है, लेकिन इन सबके बीच जलवायु परिवर्तन का संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी का बढ़ता तापमान आने वाले वर्षों में मानव सभ्यता, कृषि, जल संसाधनों और जैव विविधता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकता है। चिंता की बात यह है कि वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन कम करने के दावे तो किए जा रहे हैं, लेकिन वास्तविकता में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है। यही कारण है कि हर वर्ष तापमान के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं और चरम मौसम की घटनाएं अधिक सामान्य होती जा रही हैं।
अध्ययन में सामने आया चौंकाने वाला खुलासा
‘इंडिकेटर्स ऑफ ग्लोबल क्लाइमेट चेंज’ (आईजीसीसी) नामक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में वर्ष 2025 को रिकॉर्ड पर तीसरा सबसे गर्म वर्ष बताया गया है। इस अध्ययन को दुनिया भर के स्वतंत्र जलवायु वैज्ञानिकों ने तैयार किया है, जिनमें जलवायु परिवर्तन पर काम करने वाले कई प्रमुख विशेषज्ञ शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में वैश्विक औसत तापमान औद्योगिक युग से पहले की अवधि (1850-1900) के औसत की तुलना में लगभग 1.39 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस तापमान वृद्धि में लगभग 1.37 डिग्री सेल्सियस का योगदान सीधे तौर पर मानवीय गतिविधियों से जुड़ा पाया गया, जो अब तक के उच्चतम स्तरों में से एक है।
इंसानी गतिविधियां बन रहीं सबसे बड़ा कारण
वैज्ञानिकों का कहना है कि कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग, औद्योगिक प्रदूषण, तेजी से बढ़ती ऊर्जा खपत और वनों की कटाई ग्लोबल वार्मिंग के प्रमुख कारण हैं। रिपोर्ट के अनुसार पृथ्वी के तापमान में हो रही वृद्धि का अधिकांश हिस्सा मानवजनित उत्सर्जन से जुड़ा हुआ है। कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और अन्य ग्रीनहाउस गैसें वातावरण में गर्मी को रोककर धरती को लगातार अधिक गर्म बना रही हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि उत्सर्जन की वर्तमान गति जारी रही तो आने वाले वर्षों में तापमान वृद्धि को नियंत्रित करना और अधिक कठिन हो जाएगा।
2024 अब भी सबसे गर्म वर्ष, लेकिन खतरा बरकरार
रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2024 अब तक का सबसे गर्म वर्ष दर्ज किया गया था, जब वैश्विक तापमान औद्योगिक युग से पहले के स्तर की तुलना में लगभग 1.55 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। वर्ष 2023 भी अत्यधिक गर्म वर्षों में शामिल था। हालांकि 2025 तापमान के मामले में इन दोनों वर्षों से थोड़ा नीचे रहा, लेकिन इसमें मानव गतिविधियों का योगदान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया। यह संकेत देता है कि पृथ्वी को गर्म करने वाली मूल समस्या लगातार गहराती जा रही है और प्राकृतिक कारकों की तुलना में इंसानी प्रभाव अधिक निर्णायक होता जा रहा है।
‘ला नीना’ ने दी थोड़ी राहत, फिर भी बढ़ती रही गर्मी
विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष 2025 में ‘ला नीना’ जैसी प्राकृतिक जलवायु स्थिति सक्रिय रही, जिसका प्रभाव सामान्यतः वैश्विक तापमान को कुछ हद तक कम करने वाला माना जाता है। इसके बावजूद पृथ्वी का तापमान बेहद ऊंचे स्तर पर बना रहा। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि ‘ला नीना’ का ठंडा प्रभाव मौजूद नहीं होता, तो वर्ष 2025 का तापमान और भी अधिक हो सकता था। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि मानवीय गतिविधियों से पैदा हो रही गर्मी अब प्राकृतिक संतुलन को भी पीछे छोड़ने लगी है।
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन
आईजीसीसी की रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2025 में ग्रीनहाउस गैसों का कुल उत्सर्जन लगभग 56.8 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे अधिक स्तर माना जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसी वजह से इंसानों द्वारा उत्पन्न तापमान वृद्धि प्रत्येक दशक में लगभग 0.27 डिग्री सेल्सियस की दर से बढ़ रही है। यह रफ्तार वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है। यदि उत्सर्जन में तत्काल कमी नहीं लाई गई तो आने वाले दशकों में समुद्र स्तर वृद्धि, भीषण गर्मी, सूखा और बाढ़ जैसी घटनाएं और अधिक विनाशकारी हो सकती हैं।
2026 में ‘अल नीनो’ बढ़ा सकता है मुश्किलें
जलवायु विशेषज्ञों ने वर्ष 2026 के लिए एक और बड़ी चिंता जताई है। अनुमान है कि प्रशांत महासागर क्षेत्र में एक मजबूत ‘अल नीनो’ विकसित हो सकता है, जो सामान्यतः वैश्विक तापमान को बढ़ाने का काम करता है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो आने वाला वर्ष नए तापमान रिकॉर्ड बना सकता है। ‘अल नीनो’ के प्रभाव से कई देशों में सूखा, हीटवेव, जंगलों में आग और कृषि उत्पादन में गिरावट जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। ऐसे में वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर तत्काल और ठोस कदम उठाना समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है।