केंद्र सरकार ने गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 2026 के मसौदे को वापस लेते हुए इसे पुनर्विचार के लिए भेज दिया है। खाद्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि विभिन्न राज्य सरकारों, उद्योग संगठनों और अन्य हितधारकों से प्राप्त सुझावों और आपत्तियों के आधार पर इस मसौदे की दोबारा समीक्षा आवश्यक समझी गई है। सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है जब प्रस्तावित बदलावों को लेकर किसानों और खांडसारी उद्योग के बीच व्यापक असंतोष देखने को मिल रहा था।
60 साल पुराने नियमों में बदलाव की थी तैयारी
यह मसौदा वर्ष 1966 से लागू गन्ना (नियंत्रण) आदेश की जगह लेने के उद्देश्य से तैयार किया गया था। सरकार का उद्देश्य बदलती आर्थिक और औद्योगिक परिस्थितियों के अनुरूप नियामकीय ढांचे को आधुनिक बनाना था। प्रस्तावित मसौदे में एथनॉल उद्योग और खांडसारी इकाइयों को अधिक व्यवस्थित नियामकीय दायरे में लाने की योजना शामिल थी। हालांकि कई पक्षों ने आशंका जताई कि इन बदलावों का असर छोटे उत्पादकों और किसानों पर पड़ सकता है।
खांडसारी इकाइयों की नई परिभाषा बनी विवाद की वजह
सबसे अधिक विवाद खांडसारी इकाइयों की नई परिभाषा को लेकर सामने आया। मसौदे में प्रस्ताव था कि 10 से अधिक श्रमिकों और प्रतिदिन 500 टन से अधिक पेराई क्षमता वाली इकाइयों को खांडसारी इकाई माना जाए। वर्तमान नियमों के अनुसार यह सीमा 20 या अधिक श्रमिकों पर आधारित है और पेराई क्षमता की कोई शर्त नहीं है। उद्योग से जुड़े लोगों का तर्क था कि नई परिभाषा के कारण बड़ी संख्या में छोटे और श्रम-प्रधान उद्यम अतिरिक्त नियामकीय बोझ के दायरे में आ जाते।
किसानों ने जताई थी आय प्रभावित होने की आशंका
गन्ना उत्पादक किसानों ने भी प्रस्तावित बदलावों का विरोध किया था। उनका कहना था कि खांडसारी इकाइयां अक्सर किसानों को चीनी मिलों की तुलना में बेहतर और प्रतिस्पर्धी मूल्य प्रदान करती हैं। यदि इन इकाइयों पर अतिरिक्त नियम और प्रतिबंध लागू होते हैं, तो उनकी कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है, जिसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ सकता है। यही कारण रहा कि विभिन्न किसान संगठनों ने सरकार से मसौदे पर पुनर्विचार की मांग की थी।
सरकार ने सुझावों को दिया महत्व
खाद्य मंत्रालय द्वारा मसौदा वापस लेने का निर्णय यह संकेत देता है कि सरकार हितधारकों की राय को गंभीरता से ले रही है। सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए जारी इस मसौदे पर बड़ी संख्या में सुझाव और आपत्तियां प्राप्त हुई थीं। मंत्रालय का मानना है कि इतने व्यापक प्रभाव वाले प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय लेने से पहले सभी पक्षों की चिंताओं का समुचित मूल्यांकन आवश्यक है, ताकि कोई भी नीति संतुलित और व्यावहारिक रूप में सामने आ सके।
किसानों के हितों को प्राथमिकता देने का दावा
इस निर्णय के बाद भारतीय जनता पार्टी के सांसद संजीव बालियान ने इसे किसानों के हित में उठाया गया कदम बताया। उन्होंने कहा कि सरकार की प्राथमिकता किसानों का कल्याण है और किसी भी नीति को लागू करने से पहले उनकी सहमति और हितों का ध्यान रखा जाता है। राजनीतिक और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि मसौदा वापस लेने का फैसला सरकार की उस रणनीति को दर्शाता है, जिसमें कृषि क्षेत्र से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर व्यापक सहमति बनाने की कोशिश की जाती है।
आगे क्या होगा?
अब गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 2026 के मसौदे की दोबारा समीक्षा की जाएगी। संभावना है कि सरकार राज्य सरकारों, उद्योग प्रतिनिधियों, किसानों और अन्य हितधारकों से विस्तृत चर्चा के बाद संशोधित प्रस्ताव तैयार करे। ऐसे में आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नए मसौदे में किसानों, खांडसारी उद्योग और एथनॉल क्षेत्र के हितों के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित किया जाता है।