हरिद्वार : हरिद्वार में वार्षिक गंगा बंदी के दौरान हर की पैड़ी के वीआईपी घाट के पास गंगा की धारा में एक ट्रैक दिखाई देने के बाद इसकी चर्चा शुरू हो गई। गंगा में पानी कम होने के कारण सामने आए इस ट्रैक को देखकर लोग सवाल करने लगे कि क्या कभी यहां से ट्रेन गुजरती थी? पड़ताल में सामने आया कि यह रेलवे लाइन नहीं बल्कि ब्रिटिश काल में बांध और नहर निर्माण के दौरान इस्तेमाल की जाने वाली ट्रॉली लाइन है। इसका इस्तेमाल निर्माण सामग्री को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए किया जाता था।
गंगा बंदी के दौरान दिखाई दिया ऐतिहासिक ट्रैक
हरिद्वार में वार्षिक गंगा बंदी के चलते गंगा में पानी का प्रवाह कम होने पर नदी के भीतर मौजूद पुराना ट्रैक दिखाई देने लगा। हर की पैड़ी के वीआईपी घाट के पास ट्रैक नजर आने के बाद इसे रेलवे लाइन होने की चर्चा शुरू हो गई।
हालांकि पड़ताल में सामने आया कि यह सामान्य रेलवे ट्रैक नहीं है। बताया जाता है कि ब्रिटिश शासनकाल में बांध और नहर से जुड़े निर्माण कार्यों के लिए इस ट्रैक को बिछाया गया था। उस समय भारी निर्माण सामग्री को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए इस तरह की व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाता था।
1854 के आसपास बिछाई गई थी ट्रॉली लाइन
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस ट्रॉली ट्रैक का निर्माण ब्रिटिश काल में करीब 1854 के आसपास हुआ था। उस समय गंगा और नहर से जुड़ी संरचनाओं के निर्माण के लिए सामग्री को निर्धारित स्थानों तक पहुंचाना जरूरी था। इसके लिए नैरो गेज ट्रैक बिछाया गया, जिस पर ट्रॉली के जरिए सामान ढोया जाता था।
बताया जाता है कि उस दौर में निर्माण कार्यों से जुड़े इंजीनियरों और अधिकारियों को भी निरीक्षण के लिए इस व्यवस्था का लाभ मिलता था। यह ट्रैक निर्माण कार्यों में उपयोगी परिवहन साधन के रूप में काम करता था।
डाम कोठी से हाथी पुल तक फैला था ट्रैक
जानकारी के मुताबिक यह ट्रॉली ट्रैक डाम कोठी से हाथी पुल तक और पुराने भीमगोड़ा बैराज से दूधिया बांध तक बिछाया गया था। इसका उद्देश्य निर्माण सामग्री को अलग-अलग स्थानों तक पहुंचाना था ताकि बांध और नहर से जुड़े कार्यों को पूरा करने में सुविधा हो सके।
इस ट्रैक का इस्तेमाल केवल सामग्री ढोने तक सीमित नहीं था। निर्माण कार्यों की निगरानी और निरीक्षण के दौरान भी अधिकारी ट्रॉली के माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते थे।
दो व्यक्ति धक्का देकर चलाते थे ट्रॉली
इस ट्रैक पर इस्तेमाल होने वाली ट्रॉली का स्वरूप रेलवे ट्रैक पर चलने वाली छोटी निरीक्षण ट्रॉलियों जैसा था। इसे दो व्यक्ति धक्का देकर आगे बढ़ाते थे। इसके जरिए अधिकारी ट्रैक पुल और निर्माण से जुड़ी संरचनाओं का निरीक्षण करते थे।
यह व्यवस्था उस समय के निर्माण कार्यों के लिए उपयोगी थी जब आज की तरह परिवहन और मशीनों की सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। ट्रॉली की मदद से सामग्री और लोगों को सीमित दूरी तक ले जाना आसान हो जाता था।
दूधिया बांध के पास आज भी मौजूद है ट्रैक
बताया जाता है कि दूधिया बांध के पास लोहे के पुल पर ट्रॉली ट्रैक के अवशेष आज भी दिखाई देते हैं। इस पुल का इस्तेमाल लोग आने-जाने के लिए भी करते हैं जबकि उस पर पुरानी ट्रॉली लाइन के निशान मौजूद हैं।
ये अवशेष हरिद्वार की पुरानी जल प्रबंधन व्यवस्था और ब्रिटिश काल में किए गए निर्माण कार्यों की याद दिलाते हैं। हालांकि ट्रैक के इतिहास और इसके निर्माण से संबंधित सभी विवरणों की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि आवश्यक है।
भीमगोड़ा बैराज बनने से पहले की व्यवस्था से जुड़ा है इतिहास
जानकारी के अनुसार, वर्तमान भीमगोड़ा बैराज का निर्माण 1983-84 के आसपास हुआ था। इससे पहले भागीरथी बिंदु के डाउनस्ट्रीम चैनल में पानी आता था। उस समय पानी को नियंत्रित करने और नहर से संबंधित संरचनाओं के निर्माण के लिए विभिन्न व्यवस्थाएं की गई थीं।
इन्हीं निर्माण गतिविधियों के दौरान ट्रॉली ट्रैक का उपयोग सामग्री को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए किया जाता था। निर्माण कार्यों के साथ-साथ निरीक्षण के लिए भी यह व्यवस्था उपयोगी साबित होती थी।
रेलवे ट्रैक नहीं निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाली ट्रॉली लाइन
हरिद्वार में गंगा बंदी के दौरान दिखाई देने वाले इस ट्रैक को लेकर उठे सवालों का मुख्य जवाब यही है कि इसे रेलवे लाइन के बजाय निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाली ट्रॉली लाइन बताया गया है। यहां नियमित यात्री या मालगाड़ी चलने की जानकारी सामने नहीं आई है।
गंगा में पानी कम होने पर दिखाई देने वाला यह पुराना ट्रैक हरिद्वार के ऐतिहासिक बांध और नहर निर्माण से जुड़ी एक महत्वपूर्ण विरासत की ओर ध्यान खींचता है। इसके इतिहास निर्माण की सटीक तारीख और उपयोग की अवधि को लेकर आधिकारिक अभिलेखों से पुष्टि होने पर इस विरासत की कहानी और स्पष्ट हो सकेगी।