उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने माघ मेला 2026 के शुभारंभ और पावन पौष पूर्णिमा के अवसर पर देश-भर से आए श्रद्धालुओं, साधु-संतों और कल्पवासियों को हार्दिक बधाई दी। उन्होंने तीर्थराज प्रयाग की इस परंपरा को सनातन संस्कृति की धरोहर बताते हुए कहा कि संगम पर आस्था की डुबकी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नयन का प्रतीक है। मुख्यमंत्री ने सभी श्रद्धालुओं के मंगल की कामना करते हुए मेला क्षेत्र में सुरक्षा, स्वच्छता और सुविधाओं की समुचित व्यवस्था के निर्देश भी दिए।
सनातन परंपरा का प्रतीक: माघ मेला और आध्यात्मिक चेतना
माघ मेला भारतीय आध्यात्मिक धारा का एक अद्वितीय पर्व है, जहाँ भक्त एक महीने तक संयम, साधना और भक्ति के साथ तपस्या करते हैं। संगम तट — जहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती मिलती हैं — हिंदू दर्शन में मोक्ष और आत्मोद्धार का पावन स्थल माना गया है। यहाँ स्नान करना केवल धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म की शुद्धि का आध्यात्मिक संकल्प माना जाता है। यह मेला सनातन संस्कृति की उस निरंतरता का प्रतीक है, जो हजारों वर्षों से भारतीय जीवनदर्शन को दिशा देती आ रही है।
संगम तट पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सागर
पौष पूर्णिमा के पहले स्नान पर्व के साथ ही संगम तट पर श्रद्धालुओं का विशाल जनसैलाब उमड़ पड़ा। कड़ाके की सर्दी के बावजूद लाखों भक्त ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर माँ गंगा की आराधना कर रहे हैं। भजन-कीर्तन, मंत्रोच्चारण और आरती की ध्वनि से वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा। प्रशासन के अनुसार पहले ही दिन 25 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के डुबकी लगाने का अनुमान है। यह दृश्य दर्शाता है कि विश्वास और भक्ति की लौ कभी मंद नहीं पड़ती—बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी और अधिक प्रज्वलित होती जाती है।
75 वर्ष बाद बना दुर्लभ शुभ संयोग
इस वर्ष माघ मेले में 75 वर्ष बाद एक अत्यंत शुभ और दुर्लभ संयोग बना है, जिसने श्रद्धालुओं की आस्था को और गहरा कर दिया है। पौष पूर्णिमा से प्रारंभ होकर यह पुण्यकाल पूरे महीने कल्पवासियों के तप और साधना का साक्षी बनेगा। 20 से 25 लाख कल्पवासी एक महीने तक संयमपूर्वक व्रत, जप-तप, साधना और सत्संग में लीन रहते हैं। यह अनुशासित तपस्या भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का उच्चतम स्वरूप मानी जाती है—जहाँ जीवन का उद्देश्य आत्मशुद्धि और ईश्वरानुभूति बन जाता है।
कल्पवास—आत्मनिरीक्षण और साधना का एक पवित्र संकल्प
कल्पवास केवल भौतिक प्रवास नहीं, बल्कि आत्मिक यात्रा है। कल्पवासी साधु-संतों के मार्गदर्शन में सत्संग, ध्यान और अध्ययन के माध्यम से अपने भीतर झाँकने का प्रयास करते हैं। यह काल संयम, त्याग, सादगी और अनुशासन से भरा होता है—जहाँ मनुष्य कुछ समय के लिए सांसारिक आकर्षणों से दूर होकर आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ता है। इस प्रक्रिया में श्रद्धालु यह अनुभव करते हैं कि सच्चा सुख बाहरी जगत में नहीं, बल्कि भीतर जागने वाली शांत चेतना में निहित है।
व्यवस्था और सुरक्षा—आस्था के साथ संवेदनशीलता
मेला प्रशासन ने श्रद्धालुओं के लिए सुरक्षा, चिकित्सा, परिवहन और स्वच्छता की व्यापक व्यवस्था की है। मॉडर्न टेक्नोलॉजी, CCTV नेटवर्क और आपात सेवाओं की सुदृढ़ व्यवस्था के साथ यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि भक्तजन निर्भय होकर अपना धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कर सकें। सरकारी और स्वयंसेवी संस्थाएँ मिलकर सेवा-भाव से श्रद्धालुओं की सहायता में जुटी हुई हैं—जो इस आयोजन को और अधिक गरिमामयी बनाता है।
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