मालदा: 105 साल की उम्र में मालदा के रसीक चंद्र मंडल को आखिरकार पूरी तरह आजादी मिल गई। करीब चार दशक पुराने हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे रसीक चंद्र की बची हुई सजा सुप्रीम कोर्ट ने उनकी उम्र और खराब स्वास्थ्य को देखते हुए माफ कर दी। लंबे कानूनी संघर्ष के बाद अब वह अपने परिवार के साथ जिंदगी के बचे हुए दिन बिताएंगे। अदालत के फैसले के बाद परिवार में खुशी का माहौल है।
संपत्ति विवाद में भाई की हत्या का आरोप
रसीक चंद्र मंडल मालदा जिले के मानिकचक के पश्चिम नारायणपुर गांव के रहने वाले हैं। वर्ष 1988 में संपत्ति को लेकर हुए विवाद के बाद उनके भाई सुरेश मंडल की हत्या का मामला सामने आया था। इस मामले में रसीक चंद्र को आरोपी बनाया गया था। मामले की सुनवाई के बाद वर्ष 1994 में अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया। इसके बाद उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। उस समय रसीक चंद्र की उम्र करीब 74 वर्ष थी। इसके बाद उनके जीवन का लंबा हिस्सा जेल में ही बीता।

2018 में हाईकोर्ट से मांगी थी रिहाई
लंबे समय तक जेल में रहने के बाद रसीक चंद्र ने वर्ष 2018 में रिहाई के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अपनी बढ़ती उम्र और जेल में लंबे समय से रहने का हवाला देते हुए राहत की मांग की। हालांकि, हाईकोर्ट से उन्हें तत्काल राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने अपनी रिहाई की उम्मीद में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। शीर्ष अदालत में भी उनकी सजा को सीधे तौर पर रद्द नहीं किया गया। इस बीच लगातार बढ़ती उम्र के कारण उनकी शारीरिक स्थिति कमजोर होती चली गई।
99 साल की उम्र में लगाई समय से पहले रिहाई की गुहार
वर्ष 2020 में जब रसीक चंद्र की उम्र 99 साल हो गई, तब उन्होंने समय से पहले रिहाई के लिए आवेदन किया। आवेदन में उनकी बढ़ती उम्र के साथ-साथ उम्र संबंधी कई शारीरिक परेशानियों का उल्लेख किया गया। उनका कहना था कि इतनी अधिक उम्र में जेल की सजा जारी रखना उनके लिए बेहद कठिन है। मामले पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मई 2021 में पश्चिम बंगाल सरकार से इस संबंध में जानकारी मांगी। इसके बाद इस मामले में कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ती रही। उम्र और स्वास्थ्य से जुड़ी परिस्थितियां इस मामले में महत्वपूर्ण पहलू बन गईं।
2024 में मिली थी अंतरिम राहत
मामले की सुनवाई के दौरान नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने रसीक चंद्र को अंतरिम राहत दी। शीर्ष अदालत ने उन्हें अंतरिम जमानत या पैरोल पर जेल से बाहर आने का निर्देश दिया। इसके बाद से वह जेल से बाहर रह रहे थे। हालांकि, उस समय उनकी सजा पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। उनके मामले का अंतिम फैसला अभी बाकी था। इस दौरान उनकी उम्र 100 साल से अधिक हो चुकी थी। परिवार को अब अदालत के अंतिम फैसले का इंतजार था।
सुप्रीम कोर्ट ने बची हुई सजा की माफी का दिया फैसला
पिछले शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने मामले का अंतिम निपटारा किया। अदालत ने रसीक चंद्र की उम्र और उनकी शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखा। पीठ ने कहा कि इस उम्र में उन्हें आजीवन कारावास की बची हुई अवधि जेल में बिताने की जरूरत नहीं है। अदालत के इस फैसले के साथ उनकी बची हुई सजा माफ कर दी गई। इस तरह रसीक चंद्र को अब जेल वापस नहीं जाना होगा। दशकों तक चले कानूनी संघर्ष का आखिरकार अंत हो गया।
कमजोर हो चुकी है याददाश्त, बोलने में भी परेशानी
105 साल की उम्र में रसीक चंद्र की शारीरिक स्थिति काफी कमजोर हो चुकी है। उनकी याददाश्त भी अब पहले जैसी नहीं रही है। बताया गया है कि वह ठीक से बोल भी नहीं पाते हैं। बढ़ती उम्र के कारण उन्हें कई तरह की शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। यही वजह रही कि उनकी उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए अदालत ने मानवीय आधार पर उनकी बची सजा माफ करने का फैसला किया। अब उनके लिए परिवार के साथ समय बिताना सबसे महत्वपूर्ण होगा। लंबे समय बाद उन्हें अपने लोगों के बीच स्वतंत्र जीवन जीने का मौका मिला है।
करीब चार दशक बाद खत्म हुआ कानूनी संघर्ष
रसीक चंद्र मंडल का यह मामला करीब चार दशक तक कानूनी प्रक्रिया में रहा। वर्ष 1988 में शुरू हुए इस मामले में 1994 में उन्हें आजीवन कारावास की सजा मिली थी। इसके बाद रिहाई के लिए उन्होंने हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया। 99 साल की उम्र में दायर की गई उनकी रिहाई की याचिका पर भी वर्षों तक सुनवाई चली। आखिरकार 105 साल की उम्र में उन्हें पूरी तरह राहत मिल गई। अब जिंदगी के बचे हुए दिन वह अपने परिवार के साथ अपनी इच्छा के अनुसार गुजार सकेंगे।