कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी को विदेश में आंखों के इलाज के लिए जाने से ठीक पहले बड़ी राहत मिली है। बैंक ऑफ बड़ौदा (BoB) द्वारा अचानक फ्रीज किए गए उनके व्यक्तिगत बैंक खाते को हाईकोर्ट के कड़े रुख के बाद फिर से चालू (Active) कर दिया गया है। सोमवार (24 अगस्त 2026) को कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति कृष्ण राव की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए याचिका का निपटारा कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने बैंक अधिकारियों को भविष्य में किसी भी ग्राहक के खिलाफ ऐसी कार्रवाई करने से पहले स्पष्ट चेतावनी दी है।
अदालत का स्पष्ट रुख: खाता फ्रीज करने से पहले ग्राहक को दें सूचना
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति कृष्ण राव ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि चाहे कोई आम नागरिक हो या कोई जनप्रतिनिधि, किसी का भी खाता फ्रीज करने से पहले बैंक को ग्राहक को पहले से सूचित करना चाहिए। अदालत ने कहा कि बैंक को पहले ग्राहक को चेतावनी देनी चाहिए थी कि समय पर केवाईसी (KYC) न कराने पर खाता बंद हो सकता है। पीठ ने निर्देश दिया कि बैंक भविष्य में किसी भी ग्राहक का खाता फ्रीज करने से पहले इस प्रक्रिया का अनिवार्य रूप से पालन करे।
बैंक प्रतिनिधि ने घर जाकर पूरा किया KYC, डेबिट-क्रेडिट कार्ड हुए बहाल
इससे पहले बैंक की ओर से तर्क दिया गया था कि केवाईसी अपडेट न होने के कारण खाता अस्थायी रूप से फ्रीज किया गया था और इसमें कोई दुर्भावना नहीं थी। हालांकि, अदालत के पिछले आदेश का पालन करते हुए बैंक के प्रतिनिधियों ने खुद अभिषेक बनर्जी के आवास पर जाकर उनकी केवाईसी प्रक्रिया पूरी की। सोमवार को बैंक के वकील ने अदालत में रिपोर्ट पेश कर बताया कि खाता पूरी तरह सक्रिय कर दिया गया है और अब सांसद अपने डेबिट व क्रेडिट कार्ड का सुचारू रूप से उपयोग कर सकते हैं।
अभिषेक के वकील की दलील और बैंक का स्पष्टीकरण
अभिषेक बनर्जी के वकील अयन भट्टाचार्य ने अदालत में तर्क दिया कि उनके मुवक्किल ने कभी भी केवाईसी कराने से इनकार नहीं किया था। इसके बावजूद उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना के खाता और दोनों क्रेडिट कार्ड ब्लॉक कर दिए गए, जबकि उनकी केवाईसी की वैधता दिसंबर 2026 तक थी। उन्होंने अभिषेक को हुई परेशानी के लिए बैंक पर टोकन जुर्माना (Token Cost) लगाने की मांग की। दूसरी ओर, बैंक के वकील ने स्पष्ट किया कि उन्होंने एसएमएस के माध्यम से सूचना भेजी थी और यह कदम किसी दुर्भावना से नहीं उठाया गया था। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने मामले को समाप्त कर दिया।