कोलकाता | डिजिटल डेस्क कोलकाता का चुनावी रंग हमेशा से ही अपनी अनूठी दीवार पेंटिंग (Wall Graffiti) के लिए मशहूर रहा है। लेकिन इस बार पूर्वी कोलकाता के टेंगरा इलाके में कुछ ऐसा दिखा जिसने सबका ध्यान खींच लिया। यहाँ की दीवारों पर चुनावी नारे बंगाली में नहीं, बल्कि 'मंदारिन' (चीनी लिपि) में लिखे गए हैं। 1,000 से अधिक चीनी निवासियों वाले इस इलाके में अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ लोकतंत्र का उत्सव मनाया जा रहा है।
मंदारिन में गूंज रहा है 'जय बांग्ला' और 'खेला होबे'
टेंगरा का ऐतिहासिक चाइनाटाउन विधानसभा चुनाव की तैयारियों में रंगा हुआ है। यहाँ चीनी समुदाय के सदस्य खुद हाथों में पेंट और ब्रश लेकर दीवारों पर तृणमूल कांग्रेस के कस्बा उम्मीदवार जावेद अहमद खान के समर्थन में नारे लिख रहे हैं। खास बात यह है कि बंगाल के मशहूर नारे जैसे "जय बांग्ला" और "खेला होबे" को मंदारिन लिपि में उकेरा गया है।
"दशकों पुराना है हमारा रिश्ता"
दीवारों पर ग्राफिटी बना रहे स्थानीय निवासी स्टीवन ली ने बताया, "हम पिछले 10 सालों से मंदारिन में राजनीतिक ग्राफिटी कर रहे हैं। जावेद अंकल (जावेद खान) के साथ हमारा रिश्ता दशकों पुराना है, वे हमारे परिवार की तरह हैं।"
चीनी समुदाय के लिए अपनी भाषा में चुनावी संदेशों का महत्व केवल प्रचार तक सीमित नहीं है। मार्क वोंग नामक एक अन्य निवासी ने कहा:
"अपनी भाषा में चुनावी संदेश देखकर समुदाय सुरक्षित और आश्वस्त महसूस करता है। यह दिखाता है कि हमारे प्रतिनिधि हमें भूल नहीं रहे हैं और वे हमारी अपनी भाषा में हमसे बात करना चाहते हैं।"
मिनी इंडिया का प्रतिबिंब है 'कस्बा'
चुनाव प्रचार के दौरान खुद उम्मीदवार जावेद अहमद खान भी वहां मौजूद थे। उन्होंने कहा, "मेरा निर्वाचन क्षेत्र एक 'मिनी इंडिया' है, जहाँ देश के विभिन्न हिस्सों के लोग, अलग-अलग भाषाएं और संस्कृतियां एक साथ रहती हैं। कस्बा बंगाल का वह छोटा रूप है जहाँ हर कोई शांति से रहता है।"
टेंगरा: लुप्त होती आबादी और गहरी जड़ें
कोलकाता का चीनी समुदाय अब चौथी और पांचवीं पीढ़ी का हिस्सा है। इनका कोलकाता के साथ रिश्ता चमड़ा उद्योग, जूते बनाने और लजीज खानपान के जरिए बहुत गहरा रहा है।
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इतिहास: 1960 के दशक में इनकी आबादी लगभग 1 लाख थी।
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गिरावट: 1962 के युद्ध के बाद और फिर 1980 के दशक में बेहतर अवसरों की तलाश में ऑस्ट्रेलिया और कनाडा पलायन के कारण संख्या कम हुई।
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वर्तमान: अब केवल कुछ हजार लोग ही बचे हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक सक्रियता आज भी बरकरार है।