उज्जैन। मध्यप्रदेश के उज्जैन में शुक्रवार को इतिहास, विज्ञान और अध्यात्म का अद्भुत संगम देखने को मिला, जब ‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम’ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की शुरुआत हुई। इस आयोजन में वैदिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय पर गहन चर्चा हुई और उज्जैन को वैश्विक काल गणना केंद्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत दिए गए। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्यमंत्री मोहन यादव और केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने किया। इस अवसर पर 15 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित विज्ञान केंद्र का उद्घाटन भी हुआ।
महाकाल मानक समय पर मंथन
सम्मेलन में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात पर रही कि क्या भविष्य में Greenwich Mean Time की जगह ‘महाकाल मानक समय’ को वैश्विक मानक बनाया जा सकता है। वक्ताओं ने बताया कि प्राचीन काल में उज्जैन को शून्य देशांतर रेखा का केंद्र माना जाता था और यहीं से समय की गणना होती थी।
विकास परियोजनाओं की सौगात
कार्यक्रम के दौरान उज्जैन के विकास से जुड़ी कई बड़ी घोषणाएं भी हुईं-
सिंहस्थ 2028 के लिए 701.86 करोड़ रुपये की लागत से 4-लेन बायपास का भूमिपूजन
22.52 करोड़ रुपये की सम्राट विक्रमादित्य धरोहर परियोजना का विस्तार
विज्ञान और अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए आधुनिक विज्ञान केंद्र की शुरुआत
वैदिक ज्ञान और विज्ञान का समन्वय जरूरी
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि उज्जैन केवल धार्मिक नगरी ही नहीं, बल्कि विज्ञान और खगोल का प्राचीन केंद्र भी रहा है। यहां सदियों पहले सूर्य की छाया से समय मापने की विधि विकसित हो चुकी थी। वहीं केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि भारतीय परंपरा में समय केवल गणना नहीं, बल्कि एक अनुभूति है। उन्होंने कहा कि अब भारत को अपनी वैज्ञानिक विरासत को वैश्विक स्तर पर पुनः स्थापित करना चाहिए।
उज्जैन बनेगा विज्ञान नगरी
सरकार उज्जैन को ‘विज्ञान नगरी’ के रूप में विकसित करने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। यह सम्मेलन इस दिशा में एक मील का पत्थर माना जा रहा है। सिंहस्थ 2028 के दौरान करोड़ों श्रद्धालु यहां के वैज्ञानिक महत्व से भी परिचित होंगे।
युवाओं को जोड़ने पर जोर
विशेषज्ञों ने कहा कि आधुनिक विज्ञान के साथ युवाओं को जोड़ना समय की आवश्यकता है। सम्मेलन में खगोल शास्त्र, अंतरिक्ष तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर भी चर्चा हो रही है। इस आयोजन में 1000 से अधिक विद्यार्थी शामिल हुए हैं। ‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम’ सम्मेलन ने यह संकेत दिया है कि भारत अब अपनी प्राचीन वैज्ञानिक परंपरा को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर विश्व को नई दिशा देने की तैयारी कर रहा है। अब सवाल यही है- क्या भविष्य में दुनिया का समय ‘महाकाल’ से तय होगा?