कोलकाता: पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान वामपंथी दलों के पारंपरिक पुस्तक स्टॉलों को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। उत्तर 24 परगना के बीजपुर में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के एक बुक स्टॉल में तोड़फोड़ और आग लगाने की घटना सामने आई है। इसके अलावा कोलकाता और राज्य के दूसरे इलाकों में भी वामपंथी संगठनों के स्टॉल लगाने में बाधा डालने और तोड़फोड़ के आरोप लगे हैं। माकपा ने इन घटनाओं के लिए भाजपा समर्थित लोगों को जिम्मेदार ठहराया है, जबकि भाजपा ने अपनी संलिप्तता से इनकार किया है। यह विवाद केवल राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है। दुर्गा पूजा के दौरान पुस्तक स्टॉल लगाने की वर्षों पुरानी परंपरा, सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल, धार्मिक भावनाओं और वैचारिक अभिव्यक्ति के अधिकार को लेकर भी बहस छिड़ी हुई है।
बीजपुर में बुक स्टॉल में तोड़फोड़ और आगजनी
उत्तर 24 परगना जिले के बीजपुर के पलाशी माझीपाड़ा इलाके में चारापोल मोड़ पर लगाए गए माकपा के पुस्तक स्टॉल को 15 अक्टूबर की रात निशाना बनाए जाने का आरोप है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, अज्ञात लोगों ने पहले स्टॉल में तोड़फोड़ की और फिर आग लगा दी। स्थानीय लोगों ने आग बुझाने की कोशिश की, जिससे बड़े नुकसान को टाला जा सका। माकपा नेताओं ने इस घटना के पीछे भाजपा समर्थित लोगों का हाथ होने का आरोप लगाया है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। पुलिस के मुताबिक, इलाके में स्थिति सामान्य है और वहां सुरक्षा के लिए पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं।
कोलकाता और दूसरे इलाकों में भी बाधा डालने के आरोप
बुक स्टॉलों को लेकर विवाद के मामले केवल बीजपुर तक सीमित नहीं हैं। कोलकाता के एंटाली स्थित कामारडांगा दुर्गा पूजा समिति के पास माकपा के स्टॉल को लेकर विरोध की खबर सामने आई। यहां ‘बाम बध’ यानी वामपंथ को खत्म करने का नारा लिखे फ्लेक्स लगाए जाने और स्टॉल लगाने से रोकने का आरोप है। इसके अलावा उत्तर 24 परगना के नोआपाड़ा और पालता शांतिनगर, कोलकाता के जोरबागान, हावड़ा के शिवपुर तथा दक्षिण 24 परगना के कुलपी समेत विभिन्न स्थानों पर भी वामपंथी पुस्तक स्टॉलों में तोड़फोड़ या उन्हें लगाने में बाधा पहुंचाने की शिकायतें सामने आई हैं। माकपा का कहना है कि इन घटनाओं के जरिए उसके राजनीतिक और वैचारिक प्रचार को रोकने की कोशिश की जा रही है।
‘शारदोत्सव’ और धार्मिक परंपरा को लेकर बढ़ा विवाद
बुक स्टॉलों को लेकर राजनीतिक तनाव की एक वजह दुर्गा पूजा के स्वरूप और उसमें वामपंथी दलों की भागीदारी को लेकर जारी बहस भी है। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने सवाल उठाया है कि जो वामपंथी दल दुर्गा पूजा को ‘शारदोत्सव’ कहते हैं और धार्मिक परंपराओं को लेकर अलग विचार रखते हैं, उन्हें पूजा पंडालों के आसपास पुस्तक स्टॉल लगाने की अनुमति क्यों दी जानी चाहिए। वामपंथी दलों का तर्क है कि पुस्तक स्टॉलों के जरिए साहित्य, राजनीति और विभिन्न विचारधाराओं से जुड़ी किताबें लोगों तक पहुंचाई जाती हैं। उनके मुताबिक, किसी विचारधारा से असहमति होने पर उसका जवाब वैचारिक बहस से दिया जाना चाहिए, न कि तोड़फोड़ या आगजनी से। माकपा का कहना है कि दुर्गा पूजा के दौरान पुस्तक स्टॉल लगाने की परंपरा बंगाल के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा रही है। पार्टी नेतृत्व ने आरोप लगाया है कि मौजूदा घटनाएं स्वतंत्र अभिव्यक्ति और लोकतांत्रिक अधिकारों पर दबाव बनाने की कोशिश हैं। इन आरोपों पर भाजपा ने अपनी संलिप्तता से इनकार किया है।
बुक स्टॉलों पर कलकत्ता हाईकोर्ट में भी सुनवाई
दुर्गा पूजा के दौरान वामपंथी पुस्तक स्टॉल लगाने की अनुमति को लेकर मामला कलकत्ता हाईकोर्ट भी पहुंचा है। बोन्गांव में स्टॉल लगाने से रोके जाने के मामले में 15 अक्टूबर को एकल पीठ ने माकपा को पार्टी कार्यालय के 100 मीटर के दायरे में स्टॉल लगाने की अनुमति दी थी और पुलिस को सुरक्षा व्यवस्था करने का निर्देश दिया था। अदालत ने अलग-अलग विचारधाराओं को लोकतंत्र में जगह दिए जाने की जरूरत पर भी जोर दिया था। हालांकि, 16 अक्टूबर को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस आदेश पर रोक लगा दी। खंडपीठ ने कहा कि स्टॉल लगाने के लिए सक्षम प्राधिकरण से जरूरी अनुमति होना महत्वपूर्ण है। अदालत की इस कार्रवाई से स्पष्ट है कि वैचारिक अभिव्यक्ति के अधिकार के साथ सार्वजनिक स्थानों पर अस्थायी स्टॉल लगाने से जुड़े नियमों का पालन भी जरूरी है।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच जांच पर नजर
माकपा ने अलग-अलग इलाकों में हुई घटनाओं को लेकर भाजपा समर्थित लोगों पर आरोप लगाए हैं। भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि पार्टी का तोड़फोड़ या आगजनी से कोई संबंध नहीं है। ऐसे में घटनाओं के पीछे जिम्मेदार लोगों की पहचान और आरोपों की पुष्टि जांच के नतीजों पर निर्भर करेगी। दुर्गा पूजा के दौरान पुस्तक स्टॉलों को लेकर उठा विवाद बंगाल में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ सार्वजनिक जगहों पर वैचारिक अभिव्यक्ति के अधिकार पर भी सवाल खड़े करता है। इस पूरे मामले में जरूरी है कि हिंसा या तोड़फोड़ के आरोपों की निष्पक्ष जांच हो और किसी भी संगठन के लिए लागू अनुमति तथा कानून-व्यवस्था के नियम समान रूप से लागू किए जाएं।