अप्रेल में पारा बढ़ते ही प्रदेश में दोपहर में सूरज की तपिश चुभने लगी है। इसका असर लोगो को गर्मी में जल संकट से जद्दोजहद उठाना पड़ रहा है, तो दूसरी ओर गर्मी से पहले ही भूजल जल( water) अप्रेल में पारा बढ़ते ही प्रदेश में दोपहर में सूरज की तपिश चुभने लगी है। इसका असर लोगो को गर्मी के रूप में जद्दोजहद करना उठाना पड़ रहा है स्तर गर्त में जा रहा है। वैश्विक तापमान में वृद्धि होना, अत्यधिक मात्रा में बोर, नलकूप उत्खनन ,बढ़ती हुई जनसंख्या, जल संसाधनों का अत्यधिक उपयोग करना, उचित जल प्रबंधन की कमी, बदलती जीवनशैली एवं पर्यावरण का ह्रास जिसमें बेहिसाब पेड़ पौधे जंगल को अधोसंरचना के लिए उजाड़ा जा रहा है।
गर्मी आते ही पानी की होती हैं किल्लत
भू-जल स्तर को बनाये रखने के लिए सरकारी तौर में कई योजन चल रही है, आम जनता को भी जीवनशैली में अनुसरण करना पड़ेगा तब कही जाकर जल संकट को भविष्य में रोका जा सकता है। जल है तो कल है इसे स्लोगन नहीं जीवन स्तर में अमल करना पड़ेगा।
गर्मी के आरम्भ होने से पहले ही नदी तालाब व अन्य जल स्रोत का जलस्तर गिरने लगा हैं। शहर व ग्रामीण अंचल के कई तालाब में वर्तमान स्थिति तक निस्तारण का कार्य होता है, परंतु जलस्तर कम होने की वजह से निस्तारी के लिए भी जल नही है। दूसरी ओर रबी सीजन के लिए खेतों में लगी फसलों की सिंचाई लगातार हो रही है। यही हाल उद्योग जगत में भी है।
फसल व उद्योग के लिए बोर पंप से भु जल दोहन किए जाने से भू-जल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। भू-जल स्तर गिरने का आंकलन करने पर देखा जाए तो पहले जिस हैंडपंप पर 70 फीट में पानी था अब 100 व 120 फीट के करीब पहुंच गया है, कई स्थानों में 150 फिट तक पानी लेवल में नही आ पा रही है।
राज्य में जल संकट देखने को मिल रहा हैं
वर्तमान में जल (water) संकट एवं गिरते जलस्तर की वजह समय से पहले ही तालाब,कुआं और ढोढ़ी जैसे पारंपरिक जलस्त्रोत जवाब देने लगे हैं। इससे खेत और कंठ दोनो प्यासे रहने को मजबूर हो रहे है। जानकारों के मुताबिक अप्रेल के अंतिम दिन एवं मई के मध्य में यह समस्या विकराल रूप ले सकती हैं अगर समय रहते जिला प्रशासन व अन्य जिम्मेदार विभाग इसकी सुध नहीं ली है तो लोगों को आने वाले दिनों में जिन क्षेत्रों मे तालाब व अन्य प्राकृतिक स्रोत सूखने वाली हालत में आ जाएंगे तथा बूंद बूंद पानी के लिए जद्दोजहद करना पड़ सकता है।
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