मुंबई: में नवजोत गुलाटी और बिपाशा अरविंद के संयुक्त निर्देशन में बनी फिल्म 'पूजा मेरी जान' सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। यह फिल्म समाज में किसी महिला की 'ना' (असहमति) के महत्व और विषाक्त पुरुषवादी मानसिकता (टॉक्सिक मस्कुलिनिटी) के मुद्दे को एक तीखे कोर्टरूम ड्रामा के जरिए दर्शकों के सामने पेश करती है।
'ना' का अर्थ केवल 'ना': 'पिंक' की याद दिलाती कहानी
फिल्म की कहानी वर्ष 2016 की चर्चित फिल्म 'पिंक' के उस मूल विचार को दोहराती है कि किसी भी महिला द्वारा बोले गए 'ना' का मतलब सिर्फ 'ना' होता है। कहानी में पूजा (मृणाल ठाकुर) और अंकित (विक्रम चौहान) एक थिएटर ग्रुप में साथ काम करते हैं। 'रोमियो जूलियट' नाटक के मंचन के दौरान और बाद में ग्रीन रूम में अंकित पूजा से अपने प्यार का इजहार करता है। जब पूजा उसे मना कर देती है, तो वह इस अस्वीकृति को सहन नहीं कर पाता और आत्महत्या कर लेता है।
अदालत में उलझा आत्महत्या के उकसावे का मामला
अंकित की आत्महत्या के बाद पूजा पर खुदकुशी के लिए उकसाने (अबेटमेंट टू सुसाइड) का आरोप लगता है और मामला अदालत में पहुंचता है। इसके बाद कोर्ट रूम में वादी और प्रतिवादी पक्ष के वकीलों के बीच तीखी कानूनी बहस शुरू होती है। पूजा का पक्ष कॉर्पोरेट वकील साना (हुमा कुरैशी) रखती हैं, जबकि उनके सामने जतिन (विजय राज) बतौर वकील पैरवी करते हैं।
दोस्ती और प्यार के भ्रम को उजागर करती पटकथा
पटकथा में दिखाया गया है कि कैसे अंकित पूजा के दोस्ताना व्यवहार को प्यार समझने की भूल कर बैठा था। वह इस बात को स्वीकार नहीं कर पाया कि पूजा का अपने साथी कलाकारों के साथ घुलना-मिलना महज उसकी सामान्य जीवनशैली का हिस्सा था, न कि किसी तरह का रोमांटिक इशारा। साना अदालत में पूजा के अतीत और नाटकों के दौरान की घटनाओं के सबूत पेश कर उसे बेकसूर साबित करने का प्रयास करती है।
तीन दिग्गज कलाकारों का दमदार अभिनय
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके कलाकारों का अभिनय है। पूजा के किरदार में मृणाल ठाकुर ने अपने रोमांस और मानसिक घबराहट दोनों को बेहद सहजता से निभाया है। लंबे समय बाद हुमा कुरैशी ने एक वकील के रूप में बेहद स्वाभाविक अभिनय किया है। वहीं वकील जतिन के किरदार में विजय राज का अभिनय कोर्टरूम के दृश्यों को बेहद मजबूत बनाता है।
तकनीकी पक्ष और सामाजिक संदेश
फिल्म का छायांकन (सिनेमैटोग्राफी) जिष्णु भट्टाचार्य ने किया है, जबकि पृष्ठभूमि संगीत विशाल मिश्रा का है, जो कहानी के तनाव को बनाए रखने में मदद करता है। फिल्म अंत में एक बड़ा सामाजिक प्रश्न छोड़ती है कि क्या पुरुष प्रधान समाज में हर परिस्थिति के लिए महिला को जिम्मेदार ठहराने की प्रवृत्ति में बदलाव आएगा और क्या सोच व दृष्टिकोण में बदलाव संभव है।