देहरादून - मोबाइल फोन, टैबलेट और दूसरे डिजिटल उपकरण आज बच्चों की पढ़ाई और मनोरंजन का अहम हिस्सा बन चुके हैं। हालांकि, जरूरत से ज्यादा स्क्रीन के सामने समय बिताने का असर अब बच्चों की दिनचर्या और व्यवहार पर भी दिखाई देने लगा है। देहरादून के अस्पतालों में स्क्रीन से जुड़ी परेशानियों के साथ पहुंचने वाले बच्चों और किशोरों की संख्या में बढ़ोतरी देखी जा रही है।
अस्पतालों में बढ़े स्क्रीन से जुड़ी शिकायतों के मामले
दून अस्पताल, जिला चिकित्सालय और निजी अस्पतालों में अभिभावक बच्चों में चिड़चिड़ापन, नींद की समस्या, पढ़ाई में ध्यान न लगना, सामाजिक गतिविधियों से दूरी और व्यवहार में बदलाव जैसी शिकायतें लेकर पहुंच रहे हैं। बताया जा रहा है कि पहले जहां रोजाना करीब 10 बच्चे ऐसी समस्याओं के साथ चिकित्सकों के पास पहुंचते थे, वहीं अब यह संख्या बढ़कर लगभग 15 तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक, बच्चों के स्क्रीन इस्तेमाल पर नियंत्रण रखना केवल मोबाइल छीन लेने तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसके लिए उनकी पूरी दिनचर्या और स्क्रीन के इस्तेमाल के पीछे की वजह को समझना जरूरी है।
ज्यादा स्क्रीन टाइम का व्यवहार पर असर
राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल के मनोरोग विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. जया नवानी के अनुसार, लंबे समय तक स्क्रीन का इस्तेमाल बच्चों की नींद, व्यवहार और भावनात्मक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। ऐसे बच्चों में चिड़चिड़ापन, एकाग्रता में परेशानी और लोगों के साथ घुलने-मिलने में कमी जैसी दिक्कतें देखने को मिल सकती हैं। उनका कहना है कि माता-पिता को बच्चों के स्क्रीन टाइम की नियमित निगरानी करनी चाहिए और यह भी देखना चाहिए कि मोबाइल या टैबलेट की वजह से उनकी पढ़ाई, नींद, खेल और दूसरी गतिविधियां प्रभावित न हों।
छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन से दूरी जरूरी
विशेषज्ञों की सलाह है कि दो साल से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से दूर रखना बेहतर है। वहीं दो से पांच वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम सीमित रखा जाना चाहिए और इसे लगभग एक घंटे तक रखने की सलाह दी जाती है। छह वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों के मामले में स्क्रीन का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कराने के बजाय संतुलित रखना जरूरी है। उनकी नींद, पढ़ाई, शारीरिक गतिविधियों, खेल और सामाजिक जीवन पर स्क्रीन का नकारात्मक असर नहीं पड़ना चाहिए।
केवल मोबाइल छीनना नहीं है समाधान
जिला चिकित्सालय की मनोचिकित्सक डॉ. निशा सिंगला के मुताबिक, स्क्रीन एडिक्शन से जूझ रहे बच्चे से अचानक मोबाइल या अन्य डिजिटल उपकरण छीन लेना हमेशा प्रभावी समाधान नहीं होता। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि बच्चा स्क्रीन की ओर इतना आकर्षित क्यों हो रहा है। कई मामलों में अकेलापन, तनाव या भावनात्मक जरूरतें भी बच्चों को लगातार मोबाइल और इंटरनेट की ओर ले जा सकती हैं। ऐसे में काउंसलिंग, परिवार का सहयोग और दिनचर्या में सकारात्मक बदलाव काफी मददगार साबित हो सकते हैं।
अभिभावकों की भूमिका सबसे अहम
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने में माता-पिता की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। घर में स्क्रीन इस्तेमाल के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएं और बच्चों को खेलकूद, किताबों, रचनात्मक गतिविधियों तथा परिवार के साथ समय बिताने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। जरूरत पड़ने पर अभिभावकों को विशेषज्ञों या काउंसलर की मदद भी लेनी चाहिए, खासकर तब जब स्क्रीन इस्तेमाल के कारण बच्चे की नींद, पढ़ाई, व्यवहार या सामाजिक जीवन लगातार प्रभावित हो रहा हो।