कोलकाता: पश्चिम बंगाल में नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य में सुधार और शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए चिकित्सकों द्वारा अपनाई जा रही एक विशेष चिकित्सा पद्धति के बेहद सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। जन्म के तुरंत बाद एक मिनट के भीतर गर्भनाल (नाड़ी) काटने की पारंपरिक प्रथा के बजाय, 'फिजियोलॉजिकल कॉर्ड क्लैम्पिंग' (PCC) तकनीक के तहत माँ की प्लेसेंटा (गर्भफूल) के स्वाभाविक रूप से बाहर आने तक नाड़ी न काटने की सिफारिश की जा रही है। दक्षिण 24 परगना जिले के कई सरकारी अस्पतालों में जून 2025 से अगस्त 2026 के बीच इस पद्धति से 28,657 प्रसव कराए गए, जिनमें नवजात शिशुओं के बीमार होने और आईसीयू में भर्ती होने की दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। इस सफलता से जुड़े शोध को अगस्त में प्रसिद्ध मेडिकल पत्रिका 'यूरोपीय जर्नल ऑफ पीडियाट्रिक्स' में भी प्रकाशित किया गया है।
क्या है PCC तकनीक और कैसे करती है काम?
आमतौर पर प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव से माँ को बचाने के लिए डॉक्टर जल्द से जल्द गर्भनाल काटकर अलग कर देते हैं, जिसे 'डिलेड कॉर्ड क्लैम्पिंग' (DCC) कहा जाता है। इसके विपरीत 'फिजियोलॉजिकल कॉर्ड क्लैम्पिंग' (PCC) में प्लेसेंटा के खुद से बाहर आने तक का इंतजार किया जाता है। वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अरुण सिंह के अनुसार, इस दौरान माँ के शरीर से नाड़ी के जरिए नवजात तक ऑक्सीजन युक्त रक्त पहुंचता रहता है, जिसमें आवश्यक एंटीबॉडीज और स्टेम सेल्स होते हैं। यह प्रक्रिया बच्चे को बाहरी वातावरण में ढलने में मदद करती है और माँ तथा शिशु दोनों के स्वास्थ्य के लिए 'संजीवनी' का काम करती है।
संक्रमण, पीलिया और मौतों में आई भारी कमी
कोलकाता मेडिकल कॉलेज द्वारा किए गए शोध और आंकड़ों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ है कि PCC पद्धति से बच्चों में स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बेहद कम हो गए हैं। नॉर्मल डिलीवरी के मामलों में DCC तकनीक से जन्मे बच्चों में पीलिया की दर जहां 2 प्रतिशत थी, वहीं PCC से यह घटकर महज 0.45 प्रतिशत रह गई। इसके अलावा, स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (SNCU) में भर्ती होने वाले बच्चों का आंकड़ा 6 प्रतिशत से घटकर 1 प्रतिशत और कोलकाता के बड़े अस्पतालों में रेफर करने की दर 9 प्रतिशत से गिरकर 1 प्रतिशत पर आ गई। सिजेरियन डिलीवरी के मामलों में भी पीलिया, रेफरल और आईसीयू में भर्ती की दरों में इसी तरह की गिरावट दर्ज की गई।
कम वजन वाले नवजातों के लिए बेहद असरदार
कम वजन (1500 ग्राम से कम) वाले नवजात शिशुओं पर किए गए विशेष अध्ययन में पाया गया कि बिना नाड़ी काटे बाहरी ऑक्सीजन देने पर शिशु मृत्यु दर 41.3 प्रतिशत से घटकर 26.6 प्रतिशत पर आ गई। इसके साथ ही, मस्तिष्क में रक्तस्राव की दर 20.6 प्रतिशत से घटकर 9.4 प्रतिशत रह गई। सामान्य वजन वाले बच्चों के मामले में प्रसव जटिलताओं के कारण दिमाग में चोट लगने का जोखिम 16 प्रतिशत से घटकर 4 प्रतिशत और मृत्यु दर 8 प्रतिशत से कम होकर मात्र 2 प्रतिशत रह गई।
स्वास्थ्य बजट और संसाधनों की बड़ी बचत
इस पद्धति के स्वास्थ्य लाभों के साथ-साथ आर्थिक फायदे भी सामने आए हैं। एक नवजात को SNCU में रखने पर प्रतिदिन लगभग 2,000 रुपये का खर्च आता है। स्वास्थ्य विभाग के विश्लेषणात्मक आंकड़ों के अनुसार, दक्षिण 24 परगना के सात केंद्रों में केवल 6 महीनों के भीतर 3 करोड़ 60 लाख रुपये की बचत हुई। अधिकारियों का अनुमान है कि यदि PCC तकनीक को पूरे राज्य में लागू कर दिया जाए, तो राज्य सरकार को सालाना करीब 1,200 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है। इसके अलावा, प्रसव के बाद महिलाओं में होने वाले अत्यधिक रक्तस्राव की घटनाओं में भी इस तरीके से कमी देखी गई है।