नई दिल्ली. भारत मौसम विज्ञान विभाग ने इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून को लेकर जो पूर्वानुमान जारी किया है, वह देश के लिए चिंताजनक संकेत दे रहा है। जून से सितंबर के बीच होने वाली मौसमी वर्षा सामान्य से कम रहने की संभावना जताई गई है। यह केवल मौसम का पूर्वानुमान नहीं, बल्कि कृषि, जल संसाधन और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा महत्वपूर्ण संकेत है, जिसका प्रभाव व्यापक स्तर पर महसूस किया जा सकता है।
दीर्घकालिक औसत से कम रहने का अनुमान
मौसम विभाग के अनुसार इस वर्ष देश में लगभग 80 सेंटीमीटर वर्षा होने की संभावना है, जबकि दीर्घकालिक औसत यानी एलपीए 87 सेंटीमीटर है। इसका मतलब है कि इस बार मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है। अनुमान के अनुसार कुल वर्षा एलपीए के लगभग 92 प्रतिशत तक रह सकती है, जिसमें थोड़ी बहुत वृद्धि या कमी संभव है। यह अंतर भले ही आंकड़ों में छोटा लगे, लेकिन इसका असर विशेष रूप से वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों पर गहरा पड़ सकता है।
डॉ. एम. महापात्र ने बताई प्रमुख वजहें
मौसम विभाग के महानिदेशक डॉ. एम. महापात्र ने बताया कि इस वर्ष मानसून की स्थिति पर वैश्विक जलवायु कारकों का गहरा प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान परिस्थितियां मानसून को कमजोर बना सकती हैं, हालांकि कुछ क्षेत्रों में स्थिति अलग भी हो सकती है। यह पूर्वानुमान वैज्ञानिक मॉडल और पिछले वर्षों के आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया है, जिससे इसकी विश्वसनीयता और बढ़ जाती है।
अल नीनो का संभावित प्रभाव
अल नीनो इस वर्ष मानसून को प्रभावित करने वाला प्रमुख कारक बन सकता है। भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में इसके विकसित होने की संभावना जताई गई है। अल नीनो के कारण समुद्र के तापमान में बदलाव आता है, जिससे मानसूनी हवाओं की दिशा और ताकत प्रभावित होती है और वर्षा में कमी आ सकती है। यही कारण है कि इस बार मानसून कमजोर रहने की आशंका बढ़ गई है।
ला नीना का असर खत्म, बढ़ी अनिश्चितता
वर्तमान में ला नीना की स्थिति धीरे-धीरे समाप्त हो रही है और जलवायु सामान्य स्थिति की ओर बढ़ रही है। ला नीना के दौरान आमतौर पर अधिक वर्षा होती है, लेकिन इसके खत्म होने के बाद वर्षा की मात्रा में गिरावट देखी जा सकती है। इस बदलाव ने मानसून के पूर्वानुमान को और अधिक अनिश्चित बना दिया है।
पॉजिटिव इंडियन ओशन डाइपोल से राहत की उम्मीद
पॉजिटिव इंडियन ओशन डाइपोल मानसून के दूसरे चरण में राहत दे सकता है। इस स्थिति में हिंद महासागर के पश्चिमी हिस्से का तापमान अधिक और पूर्वी हिस्से का कम हो जाता है, जिससे हवाओं का प्रवाह अनुकूल दिशा में होता है और वर्षा की संभावना बढ़ती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कारक अल नीनो के प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित कर सकता है।
हिमपात में कमी भी बनी वजह
मौसम विभाग के अनुसार, उत्तरी गोलार्द्ध में इस वर्ष सर्दी और वसंत के दौरान हिमपात सामान्य से कम रहा है। हिमपात का स्तर मानसून पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालता है, क्योंकि यह तापमान और वायुमंडलीय दबाव को प्रभावित करता है। कम बर्फबारी के कारण मौसम का संतुलन बिगड़ सकता है और इसका असर वर्षा के पैटर्न पर पड़ सकता है।
कृषि और जल संकट पर गहराता खतरा
कमजोर मानसून का सबसे अधिक असर कृषि क्षेत्र पर पड़ने की आशंका है। वर्षा पर निर्भर खेती वाले क्षेत्रों में उत्पादन घट सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ेगा। इसके अलावा जलाशयों में पानी की कमी से पेयजल संकट भी गहरा सकता है। यह स्थिति ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के लिए चुनौतीपूर्ण बन सकती है।
समय रहते तैयारी जरूरी
इस स्थिति को देखते हुए सरकार और प्रशासन के लिए समय रहते तैयारी करना बेहद आवश्यक हो गया है। जल संरक्षण, सूखा प्रबंधन और वैकल्पिक कृषि तकनीकों को अपनाना अब प्राथमिकता बन गया है। साथ ही, आम लोगों को भी जल संसाधनों के उपयोग में सावधानी बरतनी होगी, ताकि संभावित संकट को कम किया जा सके।