पश्चिम एशिया में हालिया तनाव और सैन्य टकराव के बाद अमेरिका और ईरान के बीच हुआ अंतरिम समझौता क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। 17 जून को हुए 14 सूत्रीय समझौते ने दोनों देशों के बीच संवाद की नई संभावनाओं का द्वार खोला है। इस व्यवस्था के तहत आगामी 60 दिनों तक विभिन्न मुद्दों पर विस्तृत बातचीत की जानी है, जिनमें ईरान का परमाणु कार्यक्रम सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय बनकर उभरा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस प्रक्रिया पर गहरी नजर बनाए हुए है क्योंकि इसका प्रभाव केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक सामरिक संतुलन पर भी पड़ेगा।
अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण को लेकर आईएईए का स्पष्ट रुख
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी ने संकेत दिया है कि ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों की जांच निश्चित रूप से की जाएगी। जापान में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान उन्होंने कहा कि निरीक्षण की प्रक्रिया समझौते का अभिन्न हिस्सा है और इसके लिए तिथियों, प्रक्रियाओं तथा तकनीकी व्यवस्थाओं पर जल्द काम शुरू किया जाएगा। उनका यह बयान इस बात का संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय एजेंसी समझौते के क्रियान्वयन को केवल कागजी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि वास्तविक निरीक्षण के माध्यम से उसकी पुष्टि करना चाहती है।
संवर्धित यूरेनियम बना सबसे बड़ा विवाद
वर्तमान बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ईरान के पास मौजूद संवर्धित यूरेनियम का भविष्य है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार ईरान के पास 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम उपलब्ध है, जो परमाणु ऊर्जा उत्पादन की सामान्य आवश्यकताओं से कहीं अधिक स्तर माना जाता है। यद्यपि हथियार निर्माण के लिए लगभग 90 प्रतिशत संवर्धन आवश्यक माना जाता है, फिर भी मौजूदा भंडार को लेकर पश्चिमी देशों की चिंताएं लगातार बनी हुई हैं। इसी कारण निरीक्षण और निगरानी को समझौते के केंद्र में रखा गया है ताकि परमाणु गतिविधियों की पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।
समझौते की सफलता के लिए निगरानी को बताया अनिवार्य
राफेल ग्रॉसी ने स्पष्ट किया कि अंतरिम समझौते के प्रावधानों के अनुसार परमाणु सामग्री, परमाणु प्रतिष्ठानों और संबंधित गतिविधियों की निगरानी अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी द्वारा की जाएगी। उनके अनुसार ऐसी निगरानी तभी संभव है जब निरीक्षकों को संबंधित स्थलों तक पहुंच प्रदान की जाए। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि निरीक्षण प्रक्रिया शीघ्र शुरू हो सकती है और यदि कोई पक्ष समझौते का पालन करना चाहता है तो उसे आवश्यक सहयोग देना होगा। इस बयान को अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा समझौते के अनुपालन को लेकर एक स्पष्ट संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
अमेरिकी भागीदारी से बढ़ी रणनीतिक अहमियत
परमाणु निरीक्षण की प्रस्तावित प्रक्रिया में केवल अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ही नहीं बल्कि अमेरिकी प्रतिनिधियों की भी भूमिका रहने की संभावना जताई गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक साक्षात्कार में कहा कि अमेरिकी विशेषज्ञ भी निरीक्षण प्रक्रिया में सहयोग करेंगे। उनका दावा है कि इस व्यवस्था पर ईरान की सहमति प्राप्त हो चुकी है। यदि ऐसा होता है तो यह पहली बार होगा जब युद्धविराम के तुरंत बाद इतनी संवेदनशील प्रक्रिया में दोनों पक्षों की प्रत्यक्ष भागीदारी देखने को मिलेगी। इससे समझौते की विश्वसनीयता बढ़ सकती है, लेकिन साथ ही राजनीतिक संवेदनशीलता भी बढ़ने की आशंका बनी रहेगी।
ईरान ने अंतिम समझौते से जोड़ी पहुंच की शर्त
जहां अंतरराष्ट्रीय एजेंसी निरीक्षण को लेकर आश्वस्त दिखाई दे रही है, वहीं ईरान ने इस विषय पर सावधानीपूर्ण रुख अपनाया है। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने स्पष्ट किया कि जिन परमाणु स्थलों या सामग्रियों पर हालिया हमले हुए हैं, वहां तत्काल पहुंच देने की कोई योजना नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसे किसी भी कदम पर तभी विचार किया जाएगा जब अमेरिका के साथ व्यापक और अंतिम समझौता हो जाए तथा ईरान पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने के लिए ठोस और व्यावहारिक कदम उठाए जाएं। यह बयान दर्शाता है कि तेहरान निरीक्षण को केवल तकनीकी विषय नहीं बल्कि व्यापक राजनीतिक और आर्थिक समझौते से जोड़कर देख रहा है।
अगले साठ दिन तय करेंगे समझौते का भविष्य
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दो महीने अमेरिका और ईरान संबंधों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। यदि निरीक्षण, प्रतिबंधों में राहत और परमाणु गतिविधियों की पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर सहमति बनती है तो क्षेत्र में लंबे समय से जारी तनाव को कम करने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। दूसरी ओर यदि निरीक्षण व्यवस्था और प्रतिबंधों को लेकर मतभेद बढ़ते हैं तो यह समझौता गंभीर चुनौतियों का सामना कर सकता है। फिलहाल पूरी दुनिया की निगाहें इस कूटनीतिक प्रक्रिया पर टिकी हैं, जो पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को नया स्वरूप देने की क्षमता रखती है।