पन्ना जिले में रुंझ और मझगांव सिंचाई परियोजना को लेकर चल रहा विवाद अब प्रशासन बनाम ग्रामीण संघर्ष का रूप लेता दिखाई दे रहा है। देर रात पुलिस द्वारा आंदोलनकारी ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर समेत कई ग्रामीणों की गिरफ्तारी के बाद आदिवासी समाज और स्थानीय ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा। दर्जनों ग्रामीण परिवार पुलिस अधीक्षक कार्यालय के सामने धरने पर बैठ गए और करीब 20 घंटे तक इंतजार करने के बाद पुलिस अधीक्षक निवेदिता नायडू ने प्रदर्शनकारियों से मुलाकात की। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार अजयगढ़ थाना में दर्ज अपराध क्रमांक 237/2026 में अमित भटनागर सहित कामता प्रसाद, केदार पाल, कमल कोदर, चक्रदीन, दीपक कुमार त्रिवेदी, शिवचरण, देश कुमार, लवकुश यादव और पचबेनी यादव को आरोपी बनाया गया है। इन सभी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 296 बी, 115(2), 119(1), 191(2), 190, 351(3), 61(2) तथा 3(5) बीएनएस के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है।
“आंदोलन दबाने की कोशिश” का आरोप, गांवों में भारी पुलिस बल तैनात
धरने में शामिल कांग्रेस विधायक विक्रांत भूरिया ने पुलिस प्रशासन के सामने ग्रामीणों का पक्ष रखते हुए आरोप लगाया कि सिंचाई परियोजनाओं के नाम पर आदिवासी परिवारों की जमीन, जल और जंगल पर दबाव बनाया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि बिना समुचित पुनर्वास, मुआवजा और स्पष्ट जानकारी दिए प्रशासन परियोजना को आगे बढ़ा रहा है। ग्रामीणों के अनुसार आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण था, लेकिन पुलिस ने रात के अंधेरे में घरों से लोगों को उठाकर गिरफ्तार किया, जिससे इलाके में भय और आक्रोश दोनों फैल गया। बताया जा रहा है कि सिंचाई विभाग के एसडीओ और ठेकेदार की शिकायत पर यह कार्रवाई की गई। इधर रुंझ बांध क्षेत्र में अभी भी बड़ी संख्या में ग्रामीण आंदोलन पर डटे हुए हैं। प्रशासन ने मौके पर भारी पुलिस बल तैनात कर दिया है और वरिष्ठ अधिकारियों के बीच लगातार बैठकों का दौर चल रहा है। स्थानीय लोगों को आशंका है कि जल्द ही आंदोलन स्थल खाली कराने की कार्रवाई हो सकती है।
जमीन, विस्थापन और भरोसे की लड़ाई बनी परियोजना
पन्ना में सिंचाई परियोजनाओं और भूमि अधिग्रहण को लेकर पहले भी ग्रामीणों द्वारा विरोध प्रदर्शन किए जाते रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि परियोजनाओं के नाम पर गांवों के अस्तित्व और आदिवासी परिवारों के भविष्य पर संकट खड़ा हो गया है। अब यह आंदोलन केवल बांध परियोजना का विरोध नहीं, बल्कि विस्थापन, पुनर्वास और प्रशासनिक कार्रवाई के खिलाफ ग्रामीण असंतोष का बड़ा प्रतीक बनता जा रहा है। ग्रामीणों का साफ कहना है कि “विकास चाहिए, लेकिन हमारे अधिकारों और सम्मान की कीमत पर नहीं।”